HMT Ranibagh Factory: देश का वक्त बताने वाली कंपनी कैसे हुई बर्बाद? एक विश्लेषण

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रानीबाग उत्तराखंड में बंद पड़ी एचएमटी घड़ी की फैक्ट्री - HMT Watch Factory Ranibagh Closed

रानीबाग, उत्तराखण्ड। आज यहाँ एचएमटी (HMT) की जो फैक्ट्री खड़ी है, वह किसी भुतहा इमारत से कम नहीं लगती। विडंबना देखिए, जो कंपनी कभी पूरे भारत का ‘वक्त’ बताती थी, आज उसका खुद का वक्त थम चुका है। यह वही एचएमटी है जिसकी घड़ी कलाई पर बांधने के लिए लोगों को सालों इंतज़ार करना पड़ता था और सिफारिशें लगानी पड़ती थीं।

लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि देश का गौरव मानी जाने वाली यह कंपनी मिट्टी में मिल गई? क्या यह सिर्फ सरकार की गलती थी या कहानी कुछ और है?

वो दौर, जब HMT का सिक्का चलता था

एक समय था जब एचएमटी भारत सरकार का सबसे प्रतिष्ठित उपक्रम था। कंपनी के पास देश के सर्वश्रेष्ठ डिज़ाइनर और इंजीनियर थे। शादी-ब्याह में एचएमटी की घड़ी देना शान की बात मानी जाती थी। डिमांड इतनी ज्यादा थी और सप्लाई इतनी कम कि बाज़ार में इसका एकछत्र राज (Monopoly) था।

समय बदला, लेकिन HMT नहीं बदली

एचएमटी की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण था- बदलाव को स्वीकार न करना। जब पूरी दुनिया ‘क्वार्ट्ज़ टेक्नोलॉजी’ (Quartz Technology) यानी बैटरी वाली घड़ियों की तरफ बढ़ रही थी, एचएमटी का मैनेजमेंट अपनी ज़िद पर अड़ा था। उनका मानना था कि वे केवल चाभी भरने वाली (Mechanical) घड़ियाँ ही बनाएंगे। ग्राहकों को भगवान मानने के बजाय उन्हें केवल इंतज़ार करवाया जाता था।

भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन का दीमक

स्थानीय लोगों और पुराने जानकारों के मुताबिक, कंपनी के अंदर भ्रष्टाचार भी चरम पर था।

  • ब्लैक मार्केटिंग: ग्राहकों को घड़ी के लिए ब्लैक में पैसा देना पड़ता था।
  • चोरी की कहानियाँ: रानीबाग फैक्ट्री के बारे में एक चर्चित किस्सा है कि कर्मचारी घड़ी के पुर्जे प्लास्टिक के डिब्बों में बंद करके पीछे बहने वाले नाले में फेंक देते थे, जिसे उनके रिश्तेदार आगे जाकर निकाल लेते थे और बाहर बेचते थे। हालांकि यह आधिकारिक तौर पर सिद्ध नहीं है, लेकिन यह उस समय की सरकारी कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान है।

जब टाटा ने दी दस्तक (The Entry of Titan)

फिर एंट्री हुई टाटा की ‘टाइटन’ (Titan) कंपनी की। टाइटन ने बाज़ार की नब्ज पकड़ी। उन्होंने डिसाइड किया कि वे केवल इलेक्ट्रॉनिक (क्वार्ट्ज़) घड़ी बनाएंगे और उसे एक ‘फैशन’ की तरह बेचेंगे।

एचएमटी को लगा कि वह सरकारी कंपनी है, इसलिए कोई प्राइवेट कंपनी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी। लेकिन टाइटन ने एचएमटी के ही रिटायर्ड अधिकारियों और इंजीनियरों को अपने साथ जोड़ा। नतीजा यह हुआ कि 50 साल पुरानी एचएमटी की बादशाहत मात्र एक साल में हिल गई। देखते ही देखते टाइटन नंबर वन बन गई और एचएमटी को पूछने वाला कोई न बचा।

जो समय के साथ नहीं चलता…

आज रानीबाग की यह बंद फैक्ट्री एक गवाह है। यह गवाह है इस बात की कि चाहे आप कितने भी बड़े क्यों न हों, अगर आप समय के साथ नहीं चलेंगे और ग्राहकों का सम्मान नहीं करेंगे, तो पतन निश्चित है।

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