भारत-नेपाल सीमा पर टैक्स की मार: रोटी-बेटी के रिश्तों में क्यों आ रही है आर्थिक दीवार?

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₹200 बाइक और ₹600 कार... क्या आम आदमी अब नेपाल की यात्रा कर पाएगा

भारत और नेपाल के बीच का रिश्ता केवल दो देशों की सीमाओं का नहीं है, बल्कि यह सदियों पुराना रोटी-बेटी का संबंध है। लेकिन पिछले कुछ समय से नेपाल सरकार द्वारा भारतीय वाहनों पर लगाया गया भारी-भरकम प्रवेश शुल्क (Entry Fee) इस पवित्र रिश्ते और आपसी व्यापार की कमर तोड़ रहा है।

अन्यायपूर्ण शुल्क ढांचा

​वर्तमान में नेपाल सरकार भारतीय वाहनों से जो शुल्क वसूल रही है, वह किसी भी दृष्टिकोण से संतुलित नहीं है:

  • दोपहिया वाहन (Bike): ₹200 प्रतिदिन
  • चार पहिया वाहन (Car): ₹600 प्रतिदिन

​कल्पना कीजिए, यदि कोई भारतीय नागरिक अपने निजी वाहन से 5 दिनों के लिए नेपाल जाता है, तो उसे केवल प्रवेश शुल्क के रूप में ₹3000 तक चुकाने पड़ रहे हैं। यह एक मध्यमवर्गीय पर्यटक और सीमावर्ती व्यापारियों के लिए बहुत बड़ा आर्थिक बोझ है।

एकतरफा नियम: समानता कहाँ है?

​अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों का सबसे बुनियादी नियम होता है— पारस्परिकता (Reciprocity)

जब भारत में नेपाली नंबर प्लेट के वाहनों को बिना किसी प्रतिदिन के शुल्क के आने-जाने की अनुमति है, तो नेपाल की तरफ से यह एकतरफा वसूली क्यों?

भारत ने हमेशा बड़े भाई की भूमिका निभाते हुए सीमाएं खुली रखी हैं, लेकिन नेपाल के इस नए वित्तीय नियमों से सीमावर्ती इलाकों (जैसे मधुबनी, रक्सौल, जोगबनी) के लोगों में भारी आक्रोश है।

पर्यटन और व्यापार पर संकट

  1. धार्मिक पर्यटन: अयोध्या से पशुपतिनाथ जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह शुल्क एक बाधा बन गया है।
  2. स्थानीय बाजार: सीमा के दोनों ओर के बाजार एक-दूसरे पर निर्भर हैं। भारी टैक्स के कारण छोटे व्यापारियों की आवाजाही कम हो गई है, जिससे दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को नुकसान हो रहा है।
  3. पारिवारिक रिश्ते: सीमावर्ती क्षेत्रों में शादियां और रिश्तेदारियां आम हैं। अब रिश्तेदारों से मिलने जाने के लिए भी ‘टैक्स’ देना पड़ रहा है।

मांग: समाधान की जरूरत

​ स्थानीय लोगों का शासन और प्रशासन से दो मुख्य मांगें:

  1. समान नियम लागू हों: या तो भारत सरकार भी नेपाली वाहनों पर समान शुल्क लागू करे, या फिर नेपाल इस शुल्क को तुरंत वापस ले।
  2. टैक्स-फ्री कॉरिडोर: कम से कम 10-20 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले स्थानीय निवासियों के लिए आवाजाही पूरी तरह टैक्स फ्री की जाए।

भारत-नेपाल संबंध केवल कागजी संधियों पर नहीं, बल्कि आपसी विश्वास पर टिके हैं। आर्थिक लाभ के लिए इस विश्वास को दांव पर लगाना उचित नहीं है। नेपाल सरकार को इस जनविरोधी फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए ताकि हमारी साझी संस्कृति और व्यापार फलता-फुलता रहे।

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