51 संदूक, 10 जनपथ और दबी हुई फाइलें — आज़ादी के इतिहास पर सबसे बड़ा सवाल

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भूमिका: जब सत्ता, सेवा नहीं रह जाती

इतिहास गवाह है कि जब सत्ता सेवा के बजाय स्वामित्व का भाव ओढ़ लेती है, तो राष्ट्र की धरोहरें ‘निजी जागीर’ बनने लगती हैं। पंडित नेहरू के कार्यकाल से जुड़े 51 संदूक दस्तावेजों का सोनिया गांधी के आवास से बरामद होना या उनका अस्तित्व स्वीकार किया जाना, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक शर्मनाक अध्याय है। यह न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि देश की जनता के साथ विश्वासघात भी है।

सत्ता का रसूख और दरबारियों की भूमिका

वर्ष 2008 में जब मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर थे, तब सत्ता का असली रिमोट कंट्रोल 10 जनपथ के पास था। उस दौर के कद्दावर नेताओं—अहमद पटेल, मोतीलाल वोरा, और तारिक अनवर जैसे रणनीतिकारों की चौकड़ी ने शायद यह तय कर लिया था कि ‘नेहरू’ मतलब सिर्फ ‘गांधी परिवार’। राष्ट्रीय संग्रहालय से 51 बक्से उठवाकर मैडम के घर पहुँचा दिए गए और किसी ने चूँ तक नहीं की। अगर सोनिया गांधी आज इस सच को न मानतीं, तो क्या होता? दोषी तो उन बेचारे अधिकारियों को बना दिया जाता जिन्होंने मजबूरी में ‘राजकुमारी’ और ‘राजकुमार’ के दरबार के आदेशों का पालन किया था।

दस्तावेजों में दफन इतिहास

इन संदूकों में बंद दस्तावेज कोई साधारण कागज नहीं हैं। इनमें 1947 के सत्ता हस्तांतरण के वे महत्वपूर्ण पत्र हैं, जो भारत के विभाजन और आजादी की असली कहानी बयां करते हैं। लेडी एडविना और माउंटबेटन के साथ नेहरू का पत्राचार निजी संपत्ति कैसे हो सकता है? अन्य राष्ट्रध्यक्षों के साथ हुआ शासकीय संवाद देश की संपत्ति है, किसी परिवार की विरासत नहीं। इन्हें सरकारी इमारत से निकालकर घर ले जाने की हिम्मत वही कर सकता है जिसे संविधान से ऊपर अपने ‘वंश’ पर भरोसा हो।

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जयपुर का खजाना: एक अनसुलझा जख्म

इतिहास की बात चली है तो आपातकाल का वह काला दौर भी याद आता है। महारानी गायत्री देवी का वह अकूत खजाना, जिसे खोजने के लिए जयगढ़ किले में सेना उतार दी गई थी। दिल्ली-जयपुर मार्ग को बंद कर दिया गया और ट्रकों के काफिले कहाँ गायब हो गए, इसका जवाब आज तक किसी फाइल में नहीं मिला। वह खजाना कहाँ गया? क्या वह भी उसी राजनीति की भेंट चढ़ गया जिसके महल आज भ्रष्टाचार और व्यक्तिवाद की नींव पर खड़े हैं?

समय बदला है, देश जागा है

यह संतोष का विषय है कि मोदी सरकार के 12वें वर्ष में ही सही, इन गुमनाम बक्सों की सुध ली गई। आज समय बदल चुका है। अब देश छोटे-बड़े, अमीर-गरीब और जात-पात की बंदिशों को तोड़कर राष्ट्रवाद की राह पर चल पड़ा है। सीमा पर अपनी जान देने वाला जवान अब यह सवाल पूछने लगा है कि उसकी मातृभूमि की ऐतिहासिक धरोहरें किसी के घर की शोभा क्यों बनी हुई थीं?

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निष्कर्ष: इतिहास जनता का होता है

दस्तावेजों का सरकारी संस्थान (PMML) में वापस पहुँचना इस बात का प्रतीक है कि अब ‘राजा-रानी’ का जमाना लद चुका है। हिंदुस्तान तब मुस्कुराता है जब देश का इतिहास सुरक्षित हाथों में होता है, न कि किसी शक्तिशाली परिवार की तिजोरियों में। उम्मीद है कि ये 51 संदूक अब देश के सामने वो सच लाएंगे जो दशकों से छिपाकर रखा गया था।

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