
कोलकाता: बंगाल की राजनीति में यू-टर्न तो कई देखे गए, लेकिन तृणमूल कांग्रेस (TMC) के प्रवक्ता रिजू दत्ता का ताजा अंदाज देख सोशल मीडिया पर हंसी और तंज का सैलाब आ गया है। कल तक जो नेता कैमरे की लाइट ऑन होते ही देख लेने और घसीटकर बाहर निकालने की धमकी दे रहे थे, आज वही कैमरे के सामने अपनी मजबूरी का रोना रो रहे हैं।
नतीजों के शोर और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बीच रिजू दत्ता के तेवर पूरी तरह ढीले पड़ चुके हैं। जो बयान कल तक आग उगल रहे थे, अब उनमें से डर की गंध आ रही है।
- कल का तेवर: हम तुम्हें ढूंढ निकालेंगे… घसीटकर बाहर लाएंगे!
- आज का स्पष्टीकरण: मुझे मजबूरी में बोलना पड़ा… मैं तो खुद डरा हुआ था। मुझे अपने परिवार की सुरक्षा की चिंता है।
सोशल मीडिया का वार: नेटिजन्स पूछ रहे हैं कि जो सत्ता के नशे में दूसरों को घसीटने की बात कर रहे थे, उन्हें अचानक अपने परिवार की याद कैसे आ गई? क्या यह वाकई हृदय परिवर्तन है या फिर बदलते वक्त की आहट पहचान कर खुद को बचाने की सेफ लैंडिंग ?
सत्ता की धमक… और फिर विक्टिम कार्ड
बंगाल की राजनीति में यह पहली बार देखा जा रहा है कि इतनी जल्दी चेहरे बदल रहे हैं। जानकार इसे पावर शिफ्ट का डर बता रहे हैं। राजनीति का दस्तूर है कि जब तक कुर्सी नीचे होती है, जुबान बेकाबू रहती है, लेकिन जैसे ही माहौल बदलता है, वही जुबान विक्टिम कार्ड खेलने लगती है।
बड़ी बातें जो चर्चा में हैं:
- मजबूरी का मुखौटा: क्या कोई प्रवक्ता इतना मजबूर हो सकता है कि सरेआम धमकी दे? या फिर यह हार के डर से उपजी सफाई है?
- परिवार की ढाल: जब दूसरों को धमकाया जा रहा था, तब परिवार की गरिमा याद नहीं आई? अब खुद पर आंच आई तो परिवार ढाल बन गया।
- बदलती हवा: बंगाल के गलियारों में चर्चा तेज है कि डराने वालों का खुद डरना इस बात का संकेत है कि अब खेला उल्टा पड़ चुका है।
गरजने वाले अब बरस नहीं पा रहे!
रिजू दत्ता का यह यू-टर्न सिर्फ एक नेता का बयान नहीं है, बल्कि उस गिरती हुई साख का प्रतीक है जहाँ बाहुबल की राजनीति अब सफाई देने पर मजबूर है। बंगाल में हवा बदल चुकी है—कल तक जो दूसरों को डराने का ठेका लिए बैठे थे, आज वो खुद कैमरे पर अपनी सुरक्षा की दुहाई दे रहे हैं।












