न्याय का चीरहरण: थाने में अनसुनी हुई चीखें, वायरल ऑडियो ने खोली सिस्टम की पोल

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मधुबनी (बिहार): जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और सत्ता की हनक मानवीय संवेदनाओं पर हावी हो जाए, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ही अंतिम उम्मीद बचता है। बिहार के मधुबनी जिले के ललमनियां थाना क्षेत्र से आई खबर सभ्य समाज को शर्मसार करने वाली है। यहाँ एक 43 वर्षीय दलित महिला, ललिता देवी को न केवल खंभे से बांधकर पीटा गया, बल्कि सार्वजनिक रूप से उनके कपड़े फाड़कर उनका मान-मर्दन किया गया।

​घटना का क्रम: भूमि विवाद और ‘दबंगई’ का नंगा नाच

​15 मार्च 2026 की दोपहर, जब ललिता देवी अपने ससुर की खतियानी जमीन पर फूस का घर बनवा रही थीं, तब गांव के ही दबंगों (अविनाश पंडित व अन्य) ने उन पर हमला बोल दिया। पीड़िता का आरोप है कि:

  • ​उन्हें जातिसूचक गालियां दी गईं।
  • ​खंभे से बांधकर बेरहमी से पिटाई की गई।
  • ​भीड़ के सामने उनकी साड़ी और ब्लाउज फाड़ दिए गए, जो किसी भी स्त्री की गरिमा पर सबसे गहरा प्रहार है।

​सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि ग्राम कचहरी पहले ही इस भूमि पर पीड़िता के पक्ष में फैसला सुना चुकी है। इसके बावजूद, न्यायिक आदेशों को ठेंगा दिखाते हुए इस बर्बरता को अंजाम दिया गया।

​पुलिस की भूमिका: फरियादी ही बना अपराधी?

​इस मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठे। पीड़िता के अनुसार:

  1. प्राथमिकी दर्ज करने में आनाकानी: थाने पहुंचने पर न्याय देने के बजाय उन्हें टालमटोल का सामना करना पड़ा।
  2. पक्षपात का आरोप: पुलिस ने कथित तौर पर आरोपियों को हिरासत से छोड़ दिया, जबकि पीड़िता पक्ष को ही थाने में रोके रखा।
  3. वायरल ऑडियो: थानाध्यक्ष और पीड़िता के बीच की कथित बातचीत का ऑडियो पुलिसिया संवेदनहीनता की पुष्टि करता है, जिसमें न्याय की गुहार लगाती महिला को प्रशासनिक दुत्कार मिल रही है।

​प्रेस का दृष्टिकोण: क्या यह सिर्फ जमीन का विवाद है?

​यह मामला महज दो गुटों के बीच जमीन की लड़ाई नहीं है। यह जातिगत वर्चस्व और पितृसत्तात्मक दमन का मिश्रण है। दलित समुदाय की महिलाओं को सॉफ्ट टारगेट बनाना और उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित करना, सामाजिक पदानुक्रम को बनाए रखने का एक पुराना और क्रूर हथियार रहा है।

​”जब पुलिस प्रशासन ‘शक्ति’ के आगे नतमस्तक हो जाता है, तो कानून की धाराएं सिर्फ कागजों का हिस्सा बनकर रह जाती हैं।”

​मुख्य सवाल जो जवाब मांगते हैं:

​वायरल ऑडियो में दिख रही संवेदनहीनता पर क्या उच्चाधिकारियों ने संज्ञान लिया है?

​क्या बिहार में SC/ST एक्ट और महिलाओं की सुरक्षा के दावे केवल कागजी हैं?

​ग्राम कचहरी के फैसले के बावजूद पुलिस ने पीड़िता को सुरक्षा क्यों नहीं मुहैया कराई?

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