
मधुबनी (बिहार): लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया और सत्ता के बीच का टकराव कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब यह टकराव निजी रंजिश और कानूनी दांव-पेच की शक्ल ले ले, तो सवाल उठना लाजिमी है। ताजा मामला बिहार के मधुबनी जिले के बाबूबरही से सामने आया है, जहां एक स्थानीय पत्रकार और मुखिया के बीच की जंग अब पुलिस की फाइलों और सचिवालय की दहलीज तक पहुंच गई है।

क्या है पूरा विवाद?
मामले की शुरुआत तब हुई जब हिन्दुस्तान दैनिक के संवाददाता दीपेंद्र दीपम ने एक खबर प्रकाशित की। खबर का शीर्षक था— बाबूबरही: हत्या मामले में पति-पत्नी गिरफ्तार। इस खबर में उल्लेख था कि हत्या के एक पुराने मामले में सतघारा पंचायत के मुखिया का नाम भी आरोपियों में शामिल है। बस यही बात सतघारा पंचायत के मुखिया नंद कुमार यादव को चुभ गई।
मुखिया नंद कुमार यादव ने पत्रकार दीपेंद्र दीपम के खिलाफ कांड संख्या 155/26 के तहत रंगदारी मांगने और छवि खराब करने की प्राथमिकी (FIR) दर्ज करा दी। मुखिया का आरोप है कि पत्रकार ने उनसे 10 हजार रुपये की मांग की और पैसे न देने पर झूठी खबर छापकर उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई।
घटनाक्रम
| तारीख/समय | घटना | मुख्य बिंदु |
|---|---|---|
| 14 नवंबर 2021 | बाबूबरही कांड सं. 263/21 | हत्या का मामला दर्ज, जिसमें रंजीत पासवान और अन्य आरोपी बने। |
| 23 मार्च 2026 | खबर का प्रकाशन | ‘हिन्दुस्तान’ में दीपेंद्र दीपम द्वारा हत्या मामले में गिरफ्तारी की खबर छपी। |
| 23 मार्च 2026 | FIR दर्ज (155/26) | मुखिया नंद कुमार यादव ने पत्रकार पर रंगदारी का केस दर्ज कराया। |
| 26 मार्च 2026 | पत्रकार की अपील | दीपेंद्र दीपम ने SP, DGP और मुख्यमंत्री को न्याय के लिए पत्र भेजा। |
नोट: पहले जो रंगदारी या वसूली का मामला IPC की धाराओं में आता था, अब नए कानून के तहत BNS की धारा 308(3) जबरन वसूली (Extortion) से संबंधित है। इसमें डरा-धमका कर पैसे मांगना अपराध की श्रेणी में आता है। पत्रकार का दावा है कि उनके खिलाफ इस धारा का दुरुपयोग प्रतिशोध की भावना से किया गया है।
पत्रकार का पलटवार: यह सच को दबाने की कोशिश है
इस एफआईआर के खिलाफ पत्रकार दीपेंद्र दीपम ने भी मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने मधुबनी के पुलिस अधीक्षक (SP) सहित मुख्यमंत्री, DGP और गृह सचिव को पत्र लिखकर निष्पक्ष जांच की मांग की है। दीपेंद्र का पक्ष बेहद मजबूत और चौंकाने वाला है:
अपराधिक इतिहास का हवाला: पत्रकार ने अपने आवेदन में दावा किया है कि सूचक (मुखिया) नंद कुमार यादव का खुद का रिकॉर्ड संदेहास्पद है। उन पर बाबूबरही थाना और राजनगर थाना में हत्या से संबंधित कई मामले (जैसे कांड सं. 263/21, 219/22, 181/12) पहले से दर्ज हैं।
खबर का आधार: पत्रकार का कहना है कि उन्होंने जो खबर छापी, वह पुलिसिया कार्रवाई और कोर्ट में चल रहे मामलों पर आधारित थी।
साजिश का आरोप: दीपेंद्र दीपम का कहना है कि मुखिया अपनी दबंगई और रसूख के बल पर एक निर्भीक पत्रकार की आवाज को दबाना चाहते हैं ताकि उनके काले कारनामों पर कोई पर्दा न उठा सके।
“मैं कानून और न्याय में भरोसा रखता हूं। रंगदारी का आरोप पूरी तरह निराधार है। यह सिर्फ इसलिए किया गया है ताकि मैं इलाके की सच्चाई दिखाना बंद कर दूं।” — दीपेंद्र दीपम, पत्रकार

प्रशासनिक हलचल: न्याय की गुहार
पत्रकार ने इस मामले को लेकर बिहार के शीर्ष अधिकारियों को रजिस्टर्ड डाक के जरिए शिकायत भेजी है। इनमें शामिल हैं:
- माननीय मुख्यमंत्री, बिहार
- पुलिस महानिदेशक (DGP), पटना
- गृह सचिव, बिहार सरकार
- आईजी (कमजोर वर्ग), पटना
बाबूबरही पुलिस अब इस मामले की जांच में जुटी है। लेकिन सवाल वही खड़ा है— क्या सच लिखना आज के दौर में इतना जोखिम भरा हो गया है कि पत्रकार को ही अपराधी बनाने की कोशिश की जाए?
जनता की राय क्या है?
सोशल मीडिया और स्थानीय हलकों में इस खबर को लेकर तीखी बहस छिड़ी है। एक तरफ जनप्रतिनिधि की साख है, तो दूसरी तरफ पत्रकारिता की आजादी। अब देखना यह है कि मधुबनी पुलिस इस सुनियोजित षड्यंत्र की तह तक जाकर न्याय करती है या नहीं।
क्या आपको लगता है कि पत्रकारों पर झूठे केस दर्ज करना सत्ता का दुरुपयोग है? कमेंट में अपनी राय दें।
डिस्क्लेमर: इस लेख में प्रकाशित जानकारी प्राप्त दस्तावेजों, वायरल पत्र (Petition) और संबंधित पक्षों द्वारा लगाए गए आरोपों पर आधारित है। यह लेख किसी भी व्यक्ति, जनप्रतिनिधि या पत्रकार की छवि को धूमिल करने के उद्देश्य से नहीं लिखा गया है। चूंकि मामला वर्तमान में पुलिस जांच और न्यायालय के अधीन (Sub-judice) है, इसलिए हमारी वेबसाइट किसी भी आरोप की सत्यता की पुष्टि नहीं करती है। अंतिम निर्णय कानून सम्मत प्रक्रिया द्वारा ही मान्य होगा।