
भारत के न्यायिक इतिहास में 11 मार्च 2026 की तारीख सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से कोमा (Persistent Vegetative State) में पड़े 32 वर्षीय हरीश राणा के मामले में वह फैसला सुनाया, जिसकी चर्चा दशकों से हो रही थी। कोर्ट ने हरीश की ‘जीवन रक्षक प्रणाली’ (Life Support) हटाने की अनुमति दे दी है।
यह पहला मौका है जब 2018 के ऐतिहासिक फैसले के बाद किसी ठोस मामले में कोर्ट ने इस प्रक्रिया को हरी झंडी दिखाई है।
किस कानून और अनुच्छेद के तहत हुआ यह फैसला?
सुप्रीम कोर्ट की बेंच (जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन) ने यह आदेश भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) की व्यापक व्याख्या के आधार पर दिया है।
- अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार): कोर्ट के अनुसार, ‘जीवन के अधिकार’ में केवल जीवित रहना ही नहीं, बल्कि ‘गरिमा के साथ मरने का अधिकार’ (Right to Die with Dignity) भी शामिल है।
- कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018): इसी ऐतिहासिक फैसले में 5 जजों की संवैधानिक बेंच ने पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता दी थी। 2023 में कोर्ट ने इसके नियमों को और सरल बनाया, जिसके तहत अब हरीश राणा को राहत मिली है।
इतिहास में पहली बार क्यों? (अरुणा शानबाग से हरीश राणा तक का सफर)
लोग अक्सर अरुणा शानबाग (2011) के मामले को याद करते हैं, लेकिन वह हरीश राणा के केस से अलग था:
- अरुणा शानबाग केस (2011): सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया को सैद्धांतिक मंजूरी तो दी थी, लेकिन अरुणा के मामले में उसे लागू करने से मना कर दिया था क्योंकि अस्पताल का स्टाफ उनकी देखभाल करना चाहता था।
- हरीश राणा केस (2026): यह पहला व्यावहारिक कार्यान्वयन (Practical Application) है जहाँ कोर्ट ने सभी मेडिकल रिपोर्ट और माता-पिता की सहमति के बाद खुद ‘जीवन रक्षक प्रणाली’ (जैसे कि Clinically Assisted Nutrition) हटाने का आदेश AIIMS को दिया है।
फैसले की मुख्य बातें और कानूनी प्रक्रिया
कोर्ट ने इस फैसले तक पहुँचने के लिए एक बेहद सख्त और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन किया:
- मेडिकल बोर्ड का गठन: कोर्ट ने AIIMS दिल्ली के विशेषज्ञों का एक ‘प्राइमरी’ और ‘सेकेंडरी’ मेडिकल बोर्ड बनाया। बोर्ड ने पुष्टि की कि हरीश के मस्तिष्क में सुधार की गुंजाइश 0% है।
- मानवीय संवेदना: जस्टिस पारदीवाला ने शेक्सपियर के प्रसिद्ध वाक्य “To be or not to be” का जिक्र करते हुए कहा कि जब सुधार की कोई उम्मीद न हो, तो जीवन को मशीनों के जरिए खींचना मरीज के प्रति क्रूरता है।
- अभिभावकों की भूमिका: कोर्ट ने हरीश के माता-पिता के 13 साल के संघर्ष की सराहना की और माना कि उनका अपने बेटे को गरिमापूर्ण विदाई देने का निर्णय ‘निस्वार्थ प्रेम’ का प्रतीक है।
पैसिव vs एक्टिव यूथेनेशिया: क्या है अंतर?
यह समझना जरूरी है कि भारत में केवल ‘पैसिव’ (Passive) यूथेनेशिया ही वैध है:
| प्रकार | विवरण | कानूनी स्थिति |
| एक्टिव यूथेनेशिया | मरीज को जहर या इंजेक्शन देकर मारना। | अवैध (इसे हत्या माना जाता है) |
| पैसिव यूथेनेशिया | इलाज या जीवन रक्षक मशीनें हटा लेना ताकि प्राकृतिक मृत्यु हो सके। | वैध (कठोर नियमों के साथ) |
कानून का मानवीय चेहरा
हरीश राणा का मामला यह साबित करता है कि कानून केवल किताबों में लिखी धाराओं का नाम नहीं है, बल्कि यह समय आने पर संवेदना और मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए भी खड़ा होता है। यह फैसला भविष्य में उन हजारों परिवारों के लिए एक नजीर (Precedent) बनेगा जो अपनों को ‘वेजिटेटिव स्टेट’ की अंतहीन पीड़ा में देख रहे हैं।