⛽ पेट्रोल पंप पर सिर्फ 0 देखना काफी नहीं! तेल डलवाते समय ऐसे होता है आपके साथ खेल, इन 5 बातों का रखें खास ख्याल

Petrol Pump Fuel Purity Test and Meter Reading Fraud Awareness

आज के दौर में पेट्रोल और डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं। ऐसे में जब हम फ्यूल स्टेशन पर जाते हैं, तो हमारा पूरा ध्यान केवल मीटर के शून्य (0) पर होता है। जैसे ही कर्मचारी जीरो दिखाता है, हम निश्चिंत हो जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि असली खेल जीरो के बाद शुरू होता है?

पेट्रोल पंपों पर ठगी का तरीका अब बदल चुका है। मिलावटी तेल या गलत तरीके से फ्यूल भरने से न सिर्फ आपकी जेब पर असर पड़ता है, बल्कि आपकी गाड़ी का कीमती इंजन भी समय से पहले दम तोड़ सकता है।

1. क्वांटिटी (मात्रा) का खेल: नोज़ल पर रखें नजर

मीटर में 0 देखना जरूरी है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। तेल भरते समय ध्यान दें कि सेल्समैन ने नोज़ल को आपकी गाड़ी की टंकी में ठीक से लॉक किया है या नहीं।

  • सावधानी: अगर कर्मचारी बार-बार नोज़ल के हैंडल को दबा रहा है या बीच में रोक रहा है, तो समझ लीजिए कि तेल की मात्रा में हेर-फेर हो रही है। रुक-रुक कर तेल भरने से पाइप में हवा का दबाव बनता है, जिससे मीटर तो तेज भागता है लेकिन तेल कम निकलता है।

2. फ्यूल की शुद्धता: फिल्टर पेपर टेस्ट (Filter Paper Test)

सिर्फ मात्रा ही नहीं, तेल की क्वालिटी भी मायने रखती है। मिलावटी पेट्रोल आपके इंजन को अंदर से खोखला कर सकता है। भारत में हर ग्राहक को फिल्टर पेपर टेस्ट करने का कानूनी अधिकार है।

  • कैसे करें: पेट्रोल पंप कर्मचारी से एक सफेद फिल्टर पेपर मांगें और उस पर पेट्रोल की कुछ बूंदें डालें।
  • नतीजा: अगर पेट्रोल उड़ने के बाद पेपर पर कोई गहरा दाग रह जाता है, तो समझ लीजिए पेट्रोल मिलावटी है। शुद्ध पेट्रोल पूरी तरह उड़ जाता है और पेपर साफ रहता है।

3. 5 लीटर टेस्ट: यह आपका अधिकार है

अगर आपको लगता है कि मीटर में 10 लीटर दिख रहा है लेकिन गाड़ी में कम तेल गया है, तो आप क्वांटिटी टेस्ट की मांग कर सकते हैं। नियम के अनुसार, हर पेट्रोल पंप पर सरकारी मुहर लगा हुआ 5 लीटर का माप (Measuring Jar) होना अनिवार्य है। आप उसमें तेल डलवाकर चेक कर सकते हैं कि मशीन सही माप दे रही है या नहीं।

4. ध्यान भटकना मतलब जेब कटना

अक्सर पेट्रोल पंपों पर कर्मचारी आपको बातों में उलझा देते हैं या किसी और स्कीम के बारे में बताने लगते हैं। इसी बीच वे मीटर में हेर-फेर या रीडिंग जंप करवा देते हैं।

  • टिप: जब तक आपकी गाड़ी में तेल भरा जा रहा है, अपना पूरा ध्यान डिस्प्ले और नोज़ल पर रखें। किसी के भी कहने पर अपना ध्यान न भटकाएं।

5. बिल मांगना न भूलें

ज्यादातर लोग तेल डलवाने के बाद बिल नहीं लेते। डिजिटल ज़माने में भी पक्का बिल या ई-रसीद लेना बहुत जरूरी है।

  • क्यों जरूरी है: अगर बाद में आपकी गाड़ी के इंजन में मिलावट की वजह से खराबी आती है, तो बिना बिल के आप कोई भी कानूनी शिकायत दर्ज नहीं करा पाएंगे। बिल आपके पास मौजूद सबसे बड़ा सबूत है।

सावधानी ही बचाव है। अगली बार जब आप पेट्रोल पंप पर जाएं, तो खुद को सिर्फ 0 तक सीमित न रखें। क्वांटिटी (मात्रा) + क्वालिटी (शुद्धता) दोनों की जांच करें। आपकी थोड़ी सी जागरूकता आपको आर्थिक नुकसान और गाड़ी की बड़ी मरम्मत (Repairing) से बचा सकती है।

महाराष्ट्र में लव जिहाद का महा-खुलासा: अयान ने 180 बेटियों की जिंदगी से किया खिलवाड़, 350 वीडियो बनाकर किया ब्लैकमेल

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अमरावती (परतवाड़ा): महाराष्ट्र के अमरावती जिले से एक ऐसी रूह कंपा देने वाली खबर सामने आई है, जिसने पूरे देश के अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यक समाज के बीच के विश्वास पर सवालिया निशान लगा दिया है। पुलिस ने 19 वर्षीय दरिंदे अयान अहमद तनवीर को गिरफ्तार किया है, जिसने ‘लव जिहाद’ के जरिए करीब 180 नाबालिग लड़कियों को अपनी हवस का शिकार बनाया।

350 गंदे वीडियो और ब्लैकमेलिंग का गंदा खेल

आरोपी अयान अहमद पर आरोप है कि वह सोशल मीडिया पर अपनी पहचान छिपाकर या हिंदू लड़कियों को प्रेम जाल में फंसाकर उनसे दोस्ती करता था। इसके बाद वह उन्हें नशीला पदार्थ पिलाकर या शादी का झांसा देकर उनके साथ दुष्कर्म करता और आपत्तिजनक वीडियो बना लेता था। पुलिस की जांच में अब तक 350 से ज्यादा अश्लील वीडियो बरामद हुए हैं, जिनमें से कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी कर दिए गए हैं।

मुस्लिम संगठनों की चुप्पी पर उठ रहे सवाल

इस घटना के बाद जहां पूरा महाराष्ट्र उबल रहा है, वहीं हिंदू संगठनों ने मुस्लिम समाज और उनके संगठनों की चुप्पी पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि:

जब भी कोई मुस्लिम युवक इस तरह के जघन्य अपराध में लिप्त पाया जाता है, तो बड़े मुस्लिम संगठन और धर्मगुरु चुप्पी साध लेते हैं। आखिर क्यों इन संगठनों की ओर से अयान जैसे अपराधियों का सामाजिक बहिष्कार नहीं किया जाता?

बुलडोजर से इंसाफ, इलाके में भारी तनाव

इस घटना के विरोध में परतवाड़ा और अचलपुर पूरी तरह बंद रहे। आक्रोश को देखते हुए प्रशासन ने कड़ी कार्रवाई की है। आरोपी के अवैध ठिकानों पर बुलडोजर चलाकर उन्हें जमींदोज कर दिया गया है। बीजेपी सांसद अनिल बोंडे ने इसे एक बड़ी साजिश करार देते हुए मांग की है कि ऐसे अपराधियों को सरेआम फांसी दी जानी चाहिए।

यह मामला केवल एक अपराधी का नहीं, बल्कि समाज के उस गिरते स्तर का है जहां मासूमों की सुरक्षा दांव पर है। अगर समाज के भीतर से इन अपराधियों के खिलाफ आवाज नहीं उठी, तो खाई और गहरी होगी।

राजभवन में जब जय-वीरू की जोड़ी ने बटोरी सुर्खियां, बिजय चौधरी बने गूगल मैप और मिल गई नजरें

Bijendra Yadav and Nitish Kumar smiling at Raj Bhavan Patna

पटना। बिहार की राजनीति में 14 अप्रैल 2026 का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। एक तरफ नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर सबको चौंकाया, तो दूसरी तरफ राजभवन में हुए शपथ ग्रहण समारोह में दोस्ती और भरोसे का एक ऐसा वीडियो सामने आया जिसने सबका दिल जीत लिया। यह कहानी है बिजेंद्र प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की, जिसमें विजय कुमार चौधरी ने तड़का लगा दिया।

शपथ ली, हस्ताक्षर किए… फिर शुरू हुई तलाश

सफेद कुर्ते-पाजामे में सजे बिजेंद्र प्रसाद यादव जैसे ही मंच पर शपथ लेने पहुंचे, पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। शपथ पूरी हुई, उन्होंने कागजों पर दस्तखत किए और फिर जो हुआ वह किसी फिल्मी सीन से कम नहीं था। विजेंद्र बाबू अपनी जगह पर ठिठक गए। वे अपनी गर्दन घुमाकर इधर-उधर देखने लगे। प्रोटोकॉल कहता है कि शपथ के बाद मुख्यमंत्री का अभिवादन करना होता है, लेकिन विजेंद्र यादव को भीड़ में अपने पुराने दोस्त नीतीश कुमार नजर नहीं आ रहे थे।

विजय चौधरी का ‘इशारा’ और खिलखिला उठे नीतीश

बिजेंद्र यादव की यह बेचैनी वहां पास ही बैठे विजय कुमार चौधरी की नजरों से नहीं छुपी। विजय चौधरी ने तुरंत मोर्चा संभाला और मुस्कुराते हुए इशारों-इशारों में बिजेंद्र बाबू को रास्ता दिखाया। उन्होंने हाथ से इशारा किया— “साहब वहां बैठे हैं!”

विजय चौधरी का इशारा मिलते ही बिजेंद्र यादव की नजरें नीतीश कुमार से जा टकराईं। जैसे ही नजर से नजर मिली, दोनों नेताओं के चेहरे पर एक ऐसी चमक और मुस्कान आई जैसे सालों बाद दो बिछड़े दोस्त मिले हों। बिजेंद्र यादव ने प्रणाम किया और नीतीश कुमार ने भी बड़े प्यार से उनका अभिवादन स्वीकार किया।

दोस्ती की वो केमिस्ट्री, जो कुर्सी से ऊपर है

बिहार की राजनीति में नीतीश, बिजेंद्र और विजय चौधरी की यह तिकड़ी दशकों पुरानी है। सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि:

  • बिजेंद्र यादव: वो अटूट विश्वास जो नीतीश के साथ हर तूफान में खड़ा रहा।
  • विजय चौधरी: वो संकटमोचक जो हमेशा पुल का काम करते हैं।

क्यों वायरल हो रहा है यह पल?

राजनीति अक्सर कड़वाहट और दांव-पेंच के लिए जानी जाती है। ऐसे में राजभवन के गंभीर माहौल के बीच यह अजब-गजब वाकया बताता है कि पद आते-जाते रहते हैं, लेकिन जो साथ संघर्षों में बना रहता है, वही असली दौलत है।

लौकही बाज़ार की ऐतिहासिक हवेली: 100 साल पुराना वैभव और अनसुलझे रहस्य | Bhoomi News Live

Laukahi Bazar Haveli Madhubani

मधुबनी (लौकही): मिथिला की धरती न सिर्फ अपनी संस्कृति के लिए, बल्कि यहाँ के ज़मींदारों द्वारा बनवाई गई भव्य इमारतों के लिए भी जानी जाती है। मधुबनी जिले के लौकही बाज़ार में स्थित एक ऐसी ही विशाल हवेली आज भी सिर उठाए खड़ी है, जिसे स्थानीय लोग गया प्रसाद की हवेली के नाम से जानते हैं। लगभग एक सदी पुरानी यह इमारत आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है।

ब्रिटिश और भारतीय कला का अनूठा संगम

इस हवेली का निर्माण 1920 से 1940 के बीच माना जाता है। उस समय के प्रतिष्ठित ज़मींदार और व्यापारी गया प्रसाद ने इसे बनवाया था। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी वास्तुकला है। इसमें भारतीय पारंपरिक शैली के साथ-साथ ब्रिटिश दौर की झलक भी साफ दिखती है। हवेली की दीवारों पर लगी विदेशी नीली टाइल्स और बारीक नक्काशी आज भी इसकी भव्यता की गवाही देती है।

क्षेत्र का ‘पावर सेंटर’ और रहस्यों की चर्चा

बुजुर्ग बताते हैं कि आज़ादी से पहले और उसके कुछ समय बाद तक, यह हवेली इस पूरे क्षेत्र का पावर सेंटर हुआ करती थी। इलाके के बड़े सामाजिक और व्यापारिक फैसले इसी हवेली के आंगन में लिए जाते थे। स्थानीय पुरानी कहानियों के अनुसार, इस हवेली के भीतर गुप्त गलियारे (Secret Passages) और भूलभुलैया जैसे कमरे भी हैं, जिनका उपयोग सुरक्षा या गुप्त कार्यों के लिए किया जाता था।

संरक्षण की दरकार: जीर्ण-शीर्ण हो रही है धरोहर

देख-रेख के अभाव में अब यह ऐतिहासिक इमारत कमज़ोर होती जा रही है। छत से पानी टपकना और दीवारों का दरकना शुरू हो गया है। यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो लौकही के इतिहास का यह जीता-जागता पन्ना हमेशा के लिए बंद हो सकता है।

भ्रष्टाचार का हाई वोल्टेज: लाइनमैन से बना करोड़पति, आर्थिक अपराध इकाई (EOU) के रडार पर दरभंगा का ओम प्रकाश

दरभंगा करोड़पति लाइनमैन ओम प्रकाश आलीशान मकान जांच
प्रतीकात्मक चित्र (AI द्वारा निर्मित)

दरभंगा। बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही ‘जीरो टॉलरेंस’ की मुहिम के बीच एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। बिजली विभाग के बहादुरपुर सेक्शन में तैनात एक साधारण सा लाइनमैन, ओम प्रकाश, आज अपनी अकूत संपत्ति और आलीशान जीवनशैली के कारण आर्थिक अपराध इकाई (EOU) के निशाने पर है। आरोप है कि लाइनमैन की वर्दी की आड़ में ओम प्रकाश ने लाइजनिंग और उगाही का ऐसा साम्राज्य खड़ा किया, जिसने उसे रातों-रात करोड़पति बना दिया।

लाइनमैन की आड़ में ‘सिंडिकेट’ का संचालन

सूत्रों के मुताबिक, ओम प्रकाश केवल बिजली के खंभों तक सीमित नहीं था। विभाग के भीतर उसकी पहचान एक ऐसे ‘लाइजनर’ के रूप में थी, जो बड़े अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच सेतु का काम करता था। आरोप है कि वह बिजली विभाग के बड़े पदाधिकारियों के लिए उगाही और लाइजनिंग (Liaisoning) का सारा खेल मैनेज करता था। इसी प्रभाव का इस्तेमाल कर उसने ठेकेदारी और अवैध वसूली के जरिए करोड़ों की काली कमाई जमा की है।

दोनार गंज का ‘सफेद महल’ चर्चा का केंद्र

दरभंगा शहर के दोनार गंज इलाके में स्थित ओम प्रकाश का आलीशान मकान इन दिनों पूरे शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है। एक लाइनमैन के वेतन से इतना भव्य और कीमती मकान बनाना नामुमकिन माना जा रहा है। स्थानीय लोगों और विभागीय सूत्रों की मानें तो यह मकान भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ा है। EOU की टीम अब इस संपत्ति के साथ-साथ अन्य निवेशों का भी ब्योरा खंगाल रही है।

EOU की रडार पर बड़ा नेटवर्क

आर्थिक अपराध इकाई को शक है कि ओम प्रकाश महज एक मोहरा है। इसके पीछे बिजली विभाग के कई बड़े सफेदपोश अधिकारियों का हाथ हो सकता है। जांच के केंद्र में मुख्य रूप से ये बिंदु हैं:

  • अवैध ठेकेदारी: क्या सरकारी पद पर रहते हुए उसने अपने करीबियों के नाम पर ठेके लिए?
  • लाइजनिंग का खेल: किन-किन बड़े अधिकारियों तक उगाही की रकम पहुंचाई जाती थी?
  • बेनामी संपत्ति: दरभंगा और उसके आसपास अन्य कितनी संपत्तियां ओम प्रकाश और उसके परिजनों के नाम पर हैं?

जीरो टॉलरेंस के तहत होगी कार्रवाई

राज्य सरकार और विभाग ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि भ्रष्टाचार में लिप्त किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को बख्शा नहीं जाएगा। ओम प्रकाश के खिलाफ सबूत जुटाए जा रहे हैं और जल्द ही उसकी संपत्तियों को कुर्क करने की प्रक्रिया भी शुरू हो सकती है। इस खुलासे के बाद बिजली विभाग के गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है, क्योंकि जांच की आंच कई वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंच सकती है।

“साधारण वेतन पाने वाला एक लाइनमैन आखिर कैसे करोड़ों का मालिक बन गया? यह जांच का विषय है। आर्थिक अपराध इकाई इस नेटवर्क की जड़ों तक पहुंचेगी।” – (विभागीय सूत्र)

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी प्राप्त सूत्रों और सोशल मीडिया पर प्रसारित सूचनाओं पर आधारित है। संबंधित विभाग या आर्थिक अपराध इकाई (EOU) द्वारा जांच अभी जारी है। किसी भी व्यक्ति पर लगे आरोपों की पुष्टि केवल कानूनी प्रक्रिया और अदालत के माध्यम से ही संभव है। हमारा उद्देश्य केवल सूचना साझा करना है, किसी की छवि को धूमिल करना नहीं।

एडमिट कार्ड बना मजाक! कैंडिडेट की फोटो की जगह छपी कुत्ते की तस्वीर, सोशल मीडिया पर वायरल

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बिहार की शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा प्रणाली अक्सर अपनी अजीबोगरीब गलतियों की वजह से सुर्खियों में रहती है। ताजा मामला एक बार फिर सिस्टम पर सवालिया निशान खड़ा कर रहा है, जहाँ एक छात्र के एडमिट कार्ड (Admit Card) पर उसकी तस्वीर की जगह एक कुत्ते की फोटो छाप दी गई।

यह मामला सामने आते ही सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और लोग विभाग की लापरवाही का जमकर मजाक उड़ा रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, यह घटना बिहार के एक प्रतिष्ठित संस्थान की परीक्षा से जुड़ी बताई जा रही है। एक अभ्यर्थी ने जब अपना एडमिट कार्ड डाउनलोड किया, तो वह दंग रह गया। कार्ड पर छात्र के नाम, पिता का नाम और अन्य विवरण तो सही थे, लेकिन ‘प्रोफाइल फोटो’ वाले कॉलम में छात्र की जगह एक कुत्ते का चेहरा नजर आ रहा था।

हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर चूक पर किसी भी स्तर (डाटा एंट्री से लेकर वेरिफिकेशन तक) पर ध्यान नहीं दिया गया और एडमिट कार्ड जारी कर दिया गया।

सोशल मीडिया पर उड़ रहा मजाक

जैसे ही इस एडमिट कार्ड का स्क्रीनशॉट इंटरनेट पर आया, यूजर्स ने बिहार के परीक्षा बोर्ड और संबंधित विभाग को आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया।

  • मीम्स की बाढ़: लोग कमेंट्स में लिख रहे हैं कि “बिहार में कुछ भी मुमकिन है।”
  • सिस्टम पर सवाल: शिक्षाविदों का मानना है कि इस तरह की गलतियां न केवल छात्र का मनोबल गिराती हैं, बल्कि परीक्षा की गंभीरता को भी खत्म करती हैं।

पहले भी हो चुके हैं ऐसे कारनामे

बिहार में एडमिट कार्ड पर किसी सेलेब्रिटी या जानवर की फोटो छपना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी कई बार एडमिट कार्ड्स पर:

  1. बॉलीवुड अभिनेत्रियों (सनी लियोन, प्रियंका चोपड़ा) की तस्वीरें।
  2. भगवान गणेश की फोटो।
  3. यहाँ तक कि राजनेताओं की फोटो भी देखी जा चुकी हैं।

विभाग की सफाई

मामला तूल पकड़ने के बाद संबंधित विभाग ने इसे तकनीकी खराबी या डाटा एंट्री ऑपरेटर की लापरवाही करार दिया है। हालांकि, छात्र के लिए यह किसी मानसिक परेशानी से कम नहीं है, क्योंकि एडमिट कार्ड में सुधार के लिए उसे अब दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहाँ हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बात कर रहे हैं, वहां इस तरह की मानवीय और तकनीकी गलतियां सिस्टम की जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती हैं।

क्या आपको लगता है कि इस तरह की गलतियों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

ऐतिहासिक फैसला: भारत में पहली बार पैसिव यूथेनेशिया को मिली मंजूरी, जानें क्या है वह कानून जिसने दी मौत की इजाजत

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भारत के न्यायिक इतिहास में 11 मार्च 2026 की तारीख सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से कोमा (Persistent Vegetative State) में पड़े 32 वर्षीय हरीश राणा के मामले में वह फैसला सुनाया, जिसकी चर्चा दशकों से हो रही थी। कोर्ट ने हरीश की ‘जीवन रक्षक प्रणाली’ (Life Support) हटाने की अनुमति दे दी है।

यह पहला मौका है जब 2018 के ऐतिहासिक फैसले के बाद किसी ठोस मामले में कोर्ट ने इस प्रक्रिया को हरी झंडी दिखाई है।

किस कानून और अनुच्छेद के तहत हुआ यह फैसला?

सुप्रीम कोर्ट की बेंच (जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन) ने यह आदेश भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) की व्यापक व्याख्या के आधार पर दिया है।

  • अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार): कोर्ट के अनुसार, ‘जीवन के अधिकार’ में केवल जीवित रहना ही नहीं, बल्कि ‘गरिमा के साथ मरने का अधिकार’ (Right to Die with Dignity) भी शामिल है।
  • कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018): इसी ऐतिहासिक फैसले में 5 जजों की संवैधानिक बेंच ने पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता दी थी। 2023 में कोर्ट ने इसके नियमों को और सरल बनाया, जिसके तहत अब हरीश राणा को राहत मिली है।

इतिहास में पहली बार क्यों? (अरुणा शानबाग से हरीश राणा तक का सफर)

लोग अक्सर अरुणा शानबाग (2011) के मामले को याद करते हैं, लेकिन वह हरीश राणा के केस से अलग था:

  1. अरुणा शानबाग केस (2011): सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया को सैद्धांतिक मंजूरी तो दी थी, लेकिन अरुणा के मामले में उसे लागू करने से मना कर दिया था क्योंकि अस्पताल का स्टाफ उनकी देखभाल करना चाहता था।
  2. हरीश राणा केस (2026): यह पहला व्यावहारिक कार्यान्वयन (Practical Application) है जहाँ कोर्ट ने सभी मेडिकल रिपोर्ट और माता-पिता की सहमति के बाद खुद ‘जीवन रक्षक प्रणाली’ (जैसे कि Clinically Assisted Nutrition) हटाने का आदेश AIIMS को दिया है।

फैसले की मुख्य बातें और कानूनी प्रक्रिया

कोर्ट ने इस फैसले तक पहुँचने के लिए एक बेहद सख्त और पारदर्शी प्रक्रिया का पालन किया:

  • मेडिकल बोर्ड का गठन: कोर्ट ने AIIMS दिल्ली के विशेषज्ञों का एक ‘प्राइमरी’ और ‘सेकेंडरी’ मेडिकल बोर्ड बनाया। बोर्ड ने पुष्टि की कि हरीश के मस्तिष्क में सुधार की गुंजाइश 0% है।
  • मानवीय संवेदना: जस्टिस पारदीवाला ने शेक्सपियर के प्रसिद्ध वाक्य “To be or not to be” का जिक्र करते हुए कहा कि जब सुधार की कोई उम्मीद न हो, तो जीवन को मशीनों के जरिए खींचना मरीज के प्रति क्रूरता है।
  • अभिभावकों की भूमिका: कोर्ट ने हरीश के माता-पिता के 13 साल के संघर्ष की सराहना की और माना कि उनका अपने बेटे को गरिमापूर्ण विदाई देने का निर्णय ‘निस्वार्थ प्रेम’ का प्रतीक है।

पैसिव vs एक्टिव यूथेनेशिया: क्या है अंतर?

यह समझना जरूरी है कि भारत में केवल ‘पैसिव’ (Passive) यूथेनेशिया ही वैध है:

प्रकारविवरणकानूनी स्थिति
एक्टिव यूथेनेशियामरीज को जहर या इंजेक्शन देकर मारना।अवैध (इसे हत्या माना जाता है)
पैसिव यूथेनेशियाइलाज या जीवन रक्षक मशीनें हटा लेना ताकि प्राकृतिक मृत्यु हो सके।वैध (कठोर नियमों के साथ)

कानून का मानवीय चेहरा

हरीश राणा का मामला यह साबित करता है कि कानून केवल किताबों में लिखी धाराओं का नाम नहीं है, बल्कि यह समय आने पर संवेदना और मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए भी खड़ा होता है। यह फैसला भविष्य में उन हजारों परिवारों के लिए एक नजीर (Precedent) बनेगा जो अपनों को ‘वेजिटेटिव स्टेट’ की अंतहीन पीड़ा में देख रहे हैं।

क्या भारत भी जिम्बाब्वे की राह पर है? मुफ्त की राजनीति और आर्थिक तबाही का सच

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कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया और विदेशी चैनलों पर एक वीडियो खूब वायरल हुआ था, जिसे देखकर हंसी भी आती है और डर भी लगता है। वीडियो में जिम्बाब्वे का एक लड़का बोरी भर के नोट लेकर दुकान पर सिर्फ एक चॉकलेट खरीदने पहुँचा है।

यह सुनने में किसी कॉमेडी फिल्म का सीन लग सकता है, लेकिन यह एक देश की बर्बादी की वो दास्तान है जिसे ‘मुफ्तखोरी की राजनीति’ ने लिखा है।

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सत्ता का लालच और जिम्बाब्वे का पतन

जिम्बाब्वे के शासकों ने सोचा कि सत्ता में बने रहने का सबसे आसान तरीका है—जनता को सब कुछ मुफ्त दे दो। उन्होंने लोकलुभावन वादों की झड़ी लगा दी:

  • हर नागरिक को हर महीने 10,000 जिम्बाब्वे करेंसी बांटना।
  • किसानों को एमएसपी (MSP) की अंधी गारंटी।
  • मजदूरों को बिना किसी बजट प्रावधान के भारी-भरकम पेंशन।

नतीजा?

शुरुआती तीन महीने तो जनता को लगा कि स्वर्ग धरती पर आ गया है। लेकिन चौथे महीने से हकीकत सामने आने लगी। जब बाजार में सामान कम और नोटों की बाढ़ ज्यादा हो गई, तो मुद्रा (Currency) की कीमत कौड़ियों के बराबर रह गई। आज वहां सड़कों पर नोट कचरे की तरह बिखरे मिलते हैं।

₹5 की चॉकलेट और दो बोरी नोट

आज जिम्बाब्वे की महंगाई (Hyperinflation) का आलम यह है कि यदि आप भारत में मिलने वाली मामूली ₹5 वाली कैडबरी चॉकलेट खरीदना चाहें, तो आपको दो बोरों में भरकर वहां की करेंसी ले जानी पड़ेगी। स्थिति इतनी भयावह हो गई कि सरकार को 10 मिलियन और 50 मिलियन जैसे बड़े नोट छापने पड़े, जिनकी असल कीमत एक ब्रेड के टुकड़े से भी कम है।

चेतावनी: जब अर्थव्यवस्था उत्पादन (Production) के बजाय सिर्फ नोट छापने और बांटने पर टिकी होती है, तो वह ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है।

भारत के संदर्भ में एक गंभीर सबक

आज भारत में भी कुछ ऐसी ही ताकतें सक्रिय हैं जो देश को इसी ‘जिम्बाब्वे मॉडल’ पर धकेलना चाहती हैं। जॉर्ज सोरोस जैसे विदेशी एजेंडे से प्रेरित कुछ तत्व और ‘फर्जी किसान’ आंदोलन के नाम पर देश की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डालने की मांग कर रहे हैं।

मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी और बिना सोचे-समझे दी जाने वाली गारंटियों का लालच सुनने में मीठा लगता है, लेकिन इसका अंत जिम्बाब्वे जैसा ही होता है। यदि हम आज नहीं संभले और आर्थिक अनुशासन (Economic Discipline) को महत्व नहीं दिया, तो अगली पीढ़ी को चॉकलेट खरीदने के लिए भी बोरियों की जरूरत पड़ सकती है।

हमें यह तय करना होगा कि हमें एक सशक्त और आत्मनिर्भर भारत चाहिए, या ‘रेवड़ी संस्कृति’ वाला कंगाल देश।

क्या आपको लगता है कि भारत में बढ़ती ‘फ्रीबीज’ की राजनीति हमारे भविष्य के लिए खतरा है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

BHU PhD Admission में ‘जातिगत’ खेल? JRF पास ST छात्र को मिले सिर्फ 3 नंबर, तो टॉपर को 100/100! इंटरव्यू के नाम पर भेदभाव का आरोप

वाराणसी/पटना: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU), जिसे शिक्षा का मंदिर कहा जाता है, एक बार फिर अपनी प्रवेश प्रक्रिया को लेकर सवालों के घेरे में है। सोशल मीडिया पर BHU के हिंदी विभाग की PhD प्रवेश परीक्षा (सत्र 2025-26) की एक लिस्ट वायरल हो रही है, जिसने पूरी एडमिशन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।

इस लिस्ट में जो दिख रहा है, वह सिर्फ नंबरों का अंतर नहीं, बल्कि इंटरव्यू के नाम पर चल रहे संभावित ‘खेल’ और एक होनहार छात्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ की कहानी बयां करता है।

क्या है पूरा मामला?

वायरल हो रही तस्वीर BHU के हिंदी विभाग के ‘JRF Mode’ में चयनित अभ्यर्थियों की सूची है। इसमें दो छात्रों के अंकों के बीच जमीन-आसमान का अंतर लोगों को हैरान कर रहा है:

  1. जनरल कैटेगरी (क्रम संख्या 1): विवेक कुमार को 100.000 इंडेक्स मार्क्स मिले हैं। यानी साक्षात्कार (Interview) में पूरे में पूरे अंक।
  2. ST कैटेगरी (क्रम संख्या 8): रवि कुमार राणा को मात्र 3.797 इंडेक्स मार्क्स मिले हैं।

JRF स्कॉलर को 100 में से सिर्फ 3 नंबर?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस छात्र (रवि कुमार राणा) ने भारत सरकार की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक JRF (Junior Research Fellowship) पास की हो, वह इंटरव्यू में इतना कमजोर कैसे हो सकता है कि उसे न्यूनतम अंक भी न मिलें?

पीड़ित पक्ष और सोशल मीडिया पर उठ रहे सवालों के अनुसार:

  • छात्र के पास केंद्रीय विश्वविद्यालय से मास्टर्स की डिग्री है।
  • उसने ऑल इंडिया लिखित परीक्षा पास करके मास्टर्स में दाखिला लिया था।
  • वह UGC द्वारा आयोजित JRF क्वालिफाइड है, जो उसकी अकादमिक योग्यता (Merit) का सबसे बड़ा प्रमाण है।
  • उसने फॉर्म भरने की न्यूनतम योग्यता (50% मार्क्स) भी पूरी की थी।

बावजूद इसके, इंटरव्यू पैनल ने उसे 3.797 अंक देकर रेस से बाहर कर दिया। वहीं, टॉपर को 100 में से 100 अंक मिलना किसी “चमत्कार” या “कृपा” से कम नहीं लग रहा। क्या किसी भी मौखिक परीक्षा में कोई 100% परफेक्ट हो सकता है?

इंटरव्यू बना भेदभाव का हथियार?

आरोप लगाया जा रहा है कि इंटरव्यू (साक्षात्कार) का इस्तेमाल अब सिर्फ ‘अपने लोगों’ को अंदर लाने और ‘वंचित वर्गों’ को बाहर करने के लिए किया जा रहा है।

वरिष्ठ पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का कहना है, “जो 100 प्रतिशत दिख रहा है, हो सकता है वह किसी प्रोफेसर की वंश का चिराग हो। लेकिन सवाल यह है कि एक क्षणिक साक्षात्कार से उस शोधार्थी (ST छात्र) के साथ कम अंक देकर जो भेदभाव किया गया, उसका जिम्मेदार कौन है?”

आज भी काटे जा रहे हैं ‘एकलव्य’ के अंगूठे

इस घटना ने द्रोणाचार्य और एकलव्य की पौराणिक कथा की याद दिला दी है। अंतर बस इतना है कि अब अंगूठा नहीं मांगा जाता, बल्कि इंटरव्यू में कलम की नोक से 3 से 5 नंबर देकर भविष्य काट दिया जाता है।

अक्सर यह नैरेटिव (दुष्प्रचार) फैलाया जाता है कि आदिवासी या आरक्षित वर्ग के लोग पढ़ते नहीं हैं। लेकिन जब वे JRF निकालकर अपनी योग्यता साबित करते हैं, तो सिस्टम उन्हें इंटरव्यू रूम में हरा देता है।

UGC Act क्यों जरूरी है?

यह घटना बताती है कि UGC Act और रोस्टर नियमों का कड़ाई से पालन क्यों जरूरी है। अगर यूनिवर्सिटीज को इंटरव्यू में मनमानी करने की छूट मिलेगी, तो JRF जैसी कठिन परीक्षा पास करने वाले गरीब और आदिवासी छात्रों का प्रोफेसर बनने का सपना कभी पूरा नहीं होगा।

बड़ा सवाल: क्या BHU प्रशासन इस विसंगति (Discrepancy) की जांच करवाएगा? या फिर मेरिट की हत्या कर दी जाएगी?

अपनी वैल्यू कैसे बढ़ाएं? ये 6 नियम अपना लिए तो दुनिया आपको सलाम करेगी

Man explaining how to increase self value with six rules for success and respect

Apni Value Kaise Badhaye: क्या आपको अक्सर लगता है कि लोग आपकी बातों को गंभीरता से नहीं लेते? या आप दूसरों के लिए हमेशा उपलब्ध रहते हैं, लेकिन बदले में आपको वह सम्मान नहीं मिलता जिसके आप हकदार हैं? अगर हाँ, तो आपको अपनी ‘वैल्यू’ खुद बनानी होगी।

जीवन में सम्मान और कद्र (Self Respect) मुफ्त में नहीं मिलती, इसे कमाना पड़ता है। आज हम आपको ऐसे 6 मनोवैज्ञानिक नियम बताने जा रहे हैं, जिन्हें अपनाने के बाद लोग न सिर्फ आपकी इज्जत करेंगे बल्कि आपकी गैर-मौजूदगी को महसूस भी करेंगे।

1. खुद को ‘अवेलेबल’ बनाना बंद करें (Don’t be too available)

अक्सर हम जिसे पसंद करते हैं या सम्मान देते हैं, उसे बार-बार कॉल या मैसेज करते हैं। नियम नंबर एक है— “किसी को कॉल करो तो सिर्फ एक बार करो।” अगर सामने वाला फोन नहीं उठा रहा, तो पागलों की तरह दोबारा कॉल न करें। उसकी कॉल आने का इंतजार करें। यह आपके आत्म-सम्मान (Self-Respect) को दर्शाता है कि आप खाली नहीं बैठे हैं।

2. मुफ्त की सलाह देना बंद करें

चाणक्य नीति भी कहती है कि “सलाह उसी को दें, जो मांगे।” आज के दौर में हर कोई खुद को ज्ञानी समझता है। जब आप बिना मांगे सलाह देते हैं, तो लोग आपकी बातों की कद्र नहीं करते। अपनी बुद्धिमानी को बचाकर रखें और तभी बोलें जब आपकी राय मांगी जाए। इससे आपके शब्दों का वजन बढ़ेगा।

3. कम बोलें और प्रभावी बोलें

क्या आप बहुत ज्यादा बोलते हैं? अगर हाँ, तो सावधान हो जाएं। ज्यादा बोलने वाले अक्सर अपनी गरिमा खो देते हैं।

  • जरूरत से ज्यादा बोलना बंद करें।
  • जहाँ जरूरत न हो, वहाँ सिर्फ ‘Hmmm’ या ‘Ok’ में जवाब देना सीखें।
  • रहस्यमयी (Mysterious) बनें। जब आप कम बोलते हैं, तो लोग आपको सुनने के लिए उत्सुक रहते हैं।

4. ‘ना’ (No) कहना सीखें

सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम दूसरों को खुश करने के लिए हर काम के लिए ‘हाँ’ कह देते हैं। खुद की वैल्यू बढ़ाने के लिए ‘ना’ कहना बहुत जरूरी है। अगर कोई काम आपके सिद्धांतों के खिलाफ है या आपके पास समय नहीं है, तो उसे विनम्रता से मना करें। जो लोग अपनी सीमाओं (Boundaries) का सम्मान करते हैं, दुनिया भी उन्हीं का सम्मान करती है।

5. अपनी खुशी के मालिक खुद बनें

“जो मन करे, वो कर डालो।” लोगों की परवाह करना छोड़ें कि “लोग क्या कहेंगे”। आप अपनी जिंदगी के ड्राइवर खुद हैं। जब आप दूसरों की राय से डरना छोड़ देते हैं, तो आपके अंदर एक अलग आत्मविश्वास (Confidence) दिखाई देता है, जो लोगों को आपकी ओर आकर्षित करता है।

6. तारीफ करना भी सीखें (Appreciate Others)

खुद की वैल्यू बढ़ाने का मतलब यह नहीं कि आप घमंडी हो जाएं। अगर कोई अच्छा काम करता है, तो उसकी खुलकर तारीफ करें। जब आप दूसरों को अच्छा महसूस कराते हैं, तो वे भी आपको याद रखते हैं। (जैसे: अगर इस आर्टिकल ने आपको कुछ सिखाया हो, तो कमेंट में 2 शब्द जरूर लिखें!)

हम सब परमात्मा के बच्चे हैं

अंत में याद रखें, हम सब उस परमात्मा के ही अंश हैं। अपने आप को कभी किसी से कम मत समझें। इन 6 नियमों को रटना नहीं है, बल्कि अपने जीवन में उतारना है। अपनी वैल्यू खुद करें, दुनिया आपकी वैल्यू अपने आप करने लगेगी।

क्या आप इन नियमों से सहमत हैं? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर दें।