खामेनेई की मौत और भारत में विधवा विलाप: क्या यह केवल शोक है या कुछ और?

खामेनेई की मौत और भारत में 'विधवा विलाप': क्या यह केवल शोक है या कुछ और?

हाल ही में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु के बाद भारत के कुछ हिस्सों और सोशल मीडिया के गलियारों में शोक की एक अजीब लहर देखी गई। दुःख व्यक्त करना मानवीय स्वभाव है, लेकिन जब यह दुःख उन लोगों की तरफ से आता है जिन्होंने हमेशा भारत के हितों के विरुद्ध रुख अपनाया हो, तो सवाल उठना लाजिमी है।

भारत विरोध का पुराना इतिहास

खामेनेई और ईरान के नेतृत्व ने समय-समय पर भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश की है। अगर हम इतिहास के पन्ने पलटें, तो कड़वी यादें साफ दिखाई देती हैं:

  • कश्मीर और पाकिस्तान का राग: 2017 में खामेनेई ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का खुलकर साथ दिया और दुनिया भर के मुस्लिम नेताओं को भारत के खिलाफ एकजुट होने की अपील की।
  • अनुच्छेद 370 पर बयानबाजी: 2019 में जब भारत ने अपनी संप्रभुता का इस्तेमाल करते हुए धारा 370 को हटाया, तो ईरान ने इसके खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया दी।
  • दिल्ली दंगे और CAA: 2020 में दिल्ली दंगों के दौरान उकसावे वाले बयान हों या CAA को ‘मुस्लिम विरोधी’ बताना, खामेनेई प्रशासन ने हमेशा भारत के आंतरिक फैसलों पर उंगली उठाई।

आश्चर्य की बात यह है कि जो ईरान खुद को मुस्लिमों का मसीहा बताता था, उसने अपनी सत्ता बचाने के लिए सऊदी अरब और UAE जैसे मुस्लिम देशों पर ही ड्रोन हमले करने से परहेज नहीं किया।

‘बहादुरी’ के तमगे और भारतीय राजनीति

सबसे विचलित करने वाली बात यह है कि खामेनेई को ‘शेर’ और ‘महान योद्धा’ जैसे विशेषण केवल कुछ कट्टरपंथियों द्वारा नहीं, बल्कि भारत की मुख्यधारा की राजनीति के पढ़े-लिखे नेताओं द्वारा दिए जा रहे हैं। यह वही नेतृत्व है जो भारत के अपने वीरों पर तो मौन रहता है, लेकिन विदेशी ताकतों के लिए पलकें बिछाए खड़ा रहता है।

गाँव की वो कहानी और आज का मंजर

भारत में खामनेई के लिए इस तरह का “विधवा विलाप” देखकर मुझे मेरे गाँव की एक पुरानी घटना याद आती है।

गाँव में एक युवक की अचानक मृत्यु हो गई। पूरा परिवार सदमे में था। तभी अचानक दूसरे गाँव की एक लड़की आई और शव के पास बैठकर ऐसी दहाड़ें मारकर रोने लगी कि खुद घरवाले भी हैरान रह गए। कोई नहीं जानता था कि उसका रिश्ता क्या है। बाद में पता चला कि उस रुदन के पीछे ‘अवैध प्रेम’ और ‘गर्भवती’ होने का रहस्य छिपा था। उसका रोना तो समझ आता था क्योंकि उसका निजी स्वार्थ और भविष्य उस युवक से जुड़ा था।

लेकिन सवाल यह है… भारत में जो लोग झुंड के झुंड बनाकर छाती पीट रहे हैं, उनका खामेनेई से क्या रिश्ता है? क्या यह केवल धार्मिक सहानुभूति है, या फिर इसके पीछे भी वही ‘गाँव वाली कहानी’ की तरह कोई गहरा वैचारिक और राजनीतिक स्वार्थ छिपा है?

किसी की मृत्यु पर संवेदना व्यक्त करना शिष्टाचार हो सकता है, लेकिन जिस व्यक्ति ने हमेशा आपके देश की अखंडता और निर्णयों को चुनौती दी हो, उसे अपना ‘नायक’ बनाना आत्म-सम्मान पर चोट है। यह “रुदन” श्रद्धा कम और राजनीतिक एजेंडा ज्यादा नजर आता है।

Author: KARTIK KUMAR

कार्तिक कुमार(Kartik Kumar) एक समर्पित मीडिया पेशेवर हैं जो वर्तमान में Bhoomi News Live में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। डिजिटल मीडिया के बदलते स्वरूप और समाचारों के प्रति अपनी गहरी समझ के साथ, वे जनता तक सटीक, समयबद्ध और प्रभावशाली कहानियाँ पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। कार्तिक पत्रकारिता की अखंडता (Journalistic Integrity) और सिद्धांतों के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं। वे जटिल घटनाओं और आम जनता के बीच की दूरी को पाटने का प्रयास करते हैं, ताकि समुदाय स्थानीय और राष्ट्रीय विकास के प्रति जागरूक रहे। हाई-प्रेशर न्यूज़ एनवायरनमेंट में काम करते हुए भी, कार्तिक का दृष्टिकोण "पीपल-फर्स्ट" (जनता प्रथम) रहता है, जहाँ वे सत्यता और गति के बीच संतुलन बनाए रखते हैं।

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