निर्भया कांड की 13वीं बरसी: 6 दरिंदे, एक चलती बस और वो चीखें जो आज भी दिल्ली की सड़कों पर गूँजती हैं!

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नई दिल्ली: 16 दिसंबर 2012—भारतीय इतिहास का वो काला दिन जिसे कोई भी देशवासी कभी नहीं भूल सकता। आज इस वीभत्स घटना को पूरे 13 साल बीत चुके हैं। दिल्ली की सड़कों पर एक चलती बस में जो दरिंदगी हुई थी, उसने न केवल एक बेटी की जान ली, बल्कि पूरे देश के सिस्टम और कानून को कटघरे में खड़ा कर दिया था। आज 13वीं बरसी पर देश एक बार फिर अपनी उस बेटी को याद कर रहा है और सवाल पूछ रहा है कि क्या वाकई महिलाएं अब सुरक्षित हैं?

वो खौफनाक रात: क्या हुआ था 16 दिसंबर को..?

13 साल पहले आज ही के दिन, एक पैरामेडिकल छात्रा अपने दोस्त के साथ फिल्म देखकर घर लौट रही थी। मुनिरका से बस लेने के बाद, बस में सवार 6 दरिंदों ने उसके साथ जो हैवानियत की, उसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। गंभीर हालत में उसे इलाज के लिए सिंगापुर ले जाया गया, जहां 29 दिसंबर को उसने दम तोड़ दिया।

लंबी कानूनी लड़ाई और इंसाफ

निर्भया के माता-पिता ने अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। इस मामले में:

  • कुल आरोपी: 6 (राम सिंह, मुकेश सिंह, विनय शर्मा, अक्षय ठाकुर, पवन गुप्ता और एक नाबालिग)।
  • सजा: मुख्य आरोपी राम सिंह ने जेल में आत्महत्या कर ली थी। नाबालिग को 3 साल सुधार गृह में रखने के बाद रिहा कर दिया गया।
  • फांसी: 20 मार्च 2020 को तिहाड़ जेल में चारों दोषियों (मुकेश, विनय, अक्षय और पवन) को फांसी दी गई।

कानून में क्या हुए बदलाव..?

निर्भया कांड के बाद देशभर में हुए विरोध प्रदर्शनों के कारण सरकार को ‘जस्टिस वर्मा कमेटी’ बनानी पड़ी। इसके बाद ‘क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट 2013’ पास हुआ, जिसमें:

  • बलात्कार के लिए कड़ी सजा और कुछ मामलों में मृत्युदंड का प्रावधान किया गया।
  • ​’निर्भया फंड‘ की स्थापना की गई ताकि महिला सुरक्षा के प्रोजेक्ट्स को फंड मिल सके।
  • फास्ट ट्रैक कोर्ट्स का गठन हुआ।

आज की जमीनी हकीकत

13 साल बीत जाने के बाद भी क्या हालात बदले हैं? हाल ही में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना हो या देश के अन्य हिस्सों से आने वाली खबरें, ये साबित करती हैं कि कानून सख्त होने के बावजूद अपराधी बेखौफ हैं। ‘निर्भया फंड’ के सही इस्तेमाल और पुलिस व्यवस्था में सुधार को लेकर आज भी विशेषज्ञ सवाल उठाते हैं।

निर्भया की 13वीं बरसी हमें याद दिलाती है कि न्याय केवल फांसी की सजा तक सीमित नहीं होना चाहिए। असली न्याय तब होगा जब देश की हर सड़क, हर दफ्तर और हर घर महिलाओं के लिए पूरी तरह सुरक्षित होगा। निर्भया आज एक नाम नहीं, बल्कि महिला सुरक्षा के लिए चल रही एक कभी न खत्म होने वाली जंग का प्रतीक बन चुकी है।

Note: This script is curated based on the reporting trends of Patrika and general news standards for digital platforms.

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