
हाल ही में नवाब मलिक का एक बयान चर्चा में रहा, जिसमें उन्होंने दावा किया कि “शिवसेना का जन्म हिंदुत्व के लिए नहीं हुआ था और ना ही शिवसेना कभी मूल रूप से हिंदुत्ववादी रही।” यह बयान कई लोगों को चौंका सकता है, लेकिन अगर हम 60 और 70 के दशक के मुंबई के इतिहास के पन्नों को पलटें, तो यह दावा सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि एक कड़वी हकीकत के करीब नजर आता है।
आइये जानते हैं कि आखिर शिवसेना के गठन के पीछे की असली कहानी क्या थी।
1. इंदिरा गांधी और मुंबई की ट्रेड यूनियंस की चुनौती
शिवसेना के उदय को समझने के लिए हमें उस दौर की मुंबई को समझना होगा। इंदिरा गांधी के शासनकाल में मुंबई देश के सबसे बड़े मजदूर आंदोलनों का गढ़ बन चुका था।
- हड़तालों का दौर: रेलवे से लेकर परिवहन और बिजली विभाग तक, सब कुछ ठप हो जाता था।
- बड़े नेता: शंकर गुहा नियोगी से लेकर जॉर्ज फर्नांडिस जैसे कद्दावर नेता इन यूनियनों का नेतृत्व कर रहे थे।
- महिला आंदोलन: उसी दौर में ‘पानी वाली बाई’ के नाम से मशहूर मृणाल गोरे ने पानी को लेकर इतना बड़ा आंदोलन किया, जिसे आजाद भारत का सबसे बड़ा महिला आंदोलन माना जाता है।
2. ‘क्षेत्रवाद’ का बीज: हड़ताल तोड़ने का हथियार
इंदिरा गांधी ने एक महत्वपूर्ण बात नोटिस की— इन हड़तालों में शामिल होने वाले मजदूर सिर्फ ‘भारतीय’ होते थे। वहां कोई मराठी, बिहारी या दक्षिण भारतीय नहीं था, सब एक थे। हड़तालों से निपटने और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे नेताओं (जिन्हें ‘बाहरी’ माना जा सकता था) की पैठ को तोड़ने के लिए कांग्रेस को एक ‘लोकल’ शक्ति की जरूरत थी।
रणनीति: अगर महाराष्ट्र में ‘क्षेत्रवाद’ (Regionalism) का बीज बो दिया जाए, तो यूनियनों की एकता टूट जाएगी।
3. बाल ठाकरे और ‘बजाओ पुंगी, भगाओ लुंगी’
यहीं से बाल ठाकरे का उदय हुआ। आरोप है कि इंदिरा गांधी के बढ़ावा देने पर बाल ठाकरे ने मुंबई की मजदूर एकता को तोड़ने का काम किया। उन्होंने बड़ी चालाकी से आंदोलन का रुख ‘पूंजीपतियों के खिलाफ’ से मोड़कर ‘बाहरी लोगों के खिलाफ’ कर दिया।
बाल ठाकरे ने अपनी रणनीति बहुत संभलकर बनाई:
- पहला निशाना (दक्षिण भारतीय): उन्होंने शेट्टी और अन्य दक्षिण भारतीयों के खिलाफ “बजाओ पुंगी, भगाओ लुंगी” का नारा दिया। शिवसेना के लोग दक्षिण भारतीयों को निशाना बनाने लगे।
- दूसरा निशाना (उत्तर भारतीय): जब दक्षिण भारतीयों का मुद्दा ठंडा हुआ, तो रुख उत्तर भारतीयों की तरफ मोड़ा गया।
- तीसरा निशाना (गुजराती): अंत में गुजरातियों के खिलाफ भी मोर्चा खोला गया।
यह सब एक साथ नहीं किया गया, क्योंकि अगर सभी ‘बाहरी’ एक साथ हो जाते तो शिवसेना का टिकना मुश्किल था। यह ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का एक क्लासिक उदाहरण था।
4. इमरजेंसी और शिवसेना का रुख
जो लोग आज शिवसेना को कांग्रेस विरोधी मानते हैं, उन्हें यह जानकर हैरानी होगी कि जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी (आपातकाल) लगाई थी, तब बाल ठाकरे और शिवसेना पूरी मजबूती के साथ इंदिरा गांधी के समर्थन में खड़ी थी। यह ठीक वैसा ही पैटर्न था जैसा पंजाब में भिंडरावाले या नागालैंड में अन्य गुटों के साथ देखा गया— पहले राजनीतिक फायदे के लिए किसी शक्ति को खड़ा करना और बाद में उसे अपने हाल पर छोड़ देना।
निष्कर्ष:
इतिहास गवाह है कि राजनीतिक दल अक्सर अपनी सुविधा के अनुसार विचारधारा बदलते हैं। नवाब मलिक का यह कहना कि शिवसेना का जन्म हिंदुत्व के लिए नहीं हुआ था, उस दौर की घटनाओं और कांग्रेस के साथ शिवसेना के शुरुआती समीकरणों को देखते हुए तथ्यपरक लगता है। शिवसेना ने हिंदुत्व का झंडा तब उठाया जब मुंबई में कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट यूनियनों का सफाया हो गया और उसे एक नई पहचान की जरूरत थी।
Disclaimer (अस्वीकरण): इस लेख में व्यक्त किए गए विचार पूरी तरह से लेखक के अपने हैं और यह नवाब मलिक के हालिया बयानों और उपलब्ध ऐतिहासिक घटनाओं के विश्लेषण पर आधारित है। इस लेख का उद्देश्य किसी भी राजनीतिक दल, समुदाय, व्यक्ति या समूह की भावनाओं को आहत करना या उनकी छवि खराब करना नहीं है, बल्कि राजनीतिक इतिहास के एक विशेष दृष्टिकोण को प्रस्तुत करना है। पाठकों से अनुरोध है कि वे तथ्यों की अपने स्तर पर भी पुष्टि कर लें। यह ब्लॉग किसी भी दावे की सत्यता की 100% गारंटी नहीं लेता।