
कोलकाता: बंगाल की राजनीति का वह टाइटन जहाज डूब चुका है जिसे ममता बनर्जी ने 29 साल पहले बड़ी उम्मीदों से समंदर में उतारा था। भवानीपुर की हार सिर्फ एक सीट की हार नहीं है, यह उस ब्रैंड ममता का अंत है जिसने कभी वामपंथ के 34 साल के किले को ढहाया था। आज बंगाल में कमल खिल चुका है और ममता बनर्जी अपने ही बुने हुए चक्रव्यूह में अभिमन्यु की तरह फँसकर रह गई हैं।
अपनों से गद्दारी या खुद से धोखा ?
ममता बनर्जी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में INDIA गठबंधन को जो ज़ख्म दिए, उसका गैंगरीन अब उनकी अपनी सरकार को खा गया।
- नितीश का अपमान: गठबंधन के सूत्रधार नीतीश कुमार को ठुकराकर उन्होंने जो आग लगाई थी, उसी की तपिश में आज टीएमसी झुलस रही है।
- वोट कटवा नीति: खुद को किंगमेकर समझने के फेर में दीदी ने अकेले चुनाव लड़ा, जिसका सीधा फायदा भाजपा को हुआ। इसे राजनीति में सॉइसाइडल मूव (आत्मघाती कदम) कहा जा रहा है।
आरएसएस का सॉफ्ट कॉर्नर और हार्ड रियलिटी
ममता ने हमेशा एक दोहरी राजनीति खेली। एक तरफ मंच से मोदी-शाह को ललकारा, तो दूसरी तरफ Rss को सच्चा देशभक्त बताकर अपनी ओर से खिड़की खुली रखी।
- नतीजा: न तो वह अल्पसंख्यकों का पूर्ण भरोसा जीत पाईं (सांसदों की सीएए वोटिंग में गैर-हाजिरी की वजह से), और न ही संघ ने उन्हें बख्शा। अंततः संघ की ठोस रणनीति ने उन्हें उनके ही गढ़ में चारों खाने चित कर दिया।
मुकुल रॉय सिंड्रोम: बीजेपी = टीएमसी
मुकुल रॉय ने जो कहा था, वह आज सच साबित हो रहा है। टीएमसी के आधे नेता पहले ही भाजपा की विचारधारा में रंग चुके थे। जैसे ही भवानीपुर से ममता की हार की खबर आई, टीएमसी के भीतर भगदड़ का माहौल है। अब टीएमसी के नेताओं का हश्र राघव चड्ढा जैसा होना तय है— यानी एक-एक कर जाँच एजेंसियों का शिकंजा और राजनीतिक निर्वासन।
अजगर ने निगली ममता की विरासत
जिस तरह भाजपा ने धीरे-धीरे BJD (ओडिशा), BSP (यूपी), और JDU (बिहार) जैसी क्षेत्रीय शक्तियों को बौना कर दिया, आज उसी लिस्ट में TMC का नाम सबसे ऊपर जुड़ गया है। ममता बनर्जी ने जिस भाजपा को 1997 में उंगली पकड़कर बंगाल में चलना सिखाया था, आज उसी ने उन्हें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
ममता बनर्जी ने सियासी बोया पेड़ बबूल का, तो आम कहाँ से होय वाली कहावत को सच कर दिखाया है। वामपंथ को खत्म करने के लिए उन्होंने जिस दक्षिणपंथ को खाद-पानी दिया, आज उसी ने उनकी जड़ें उखाड़ फेंकी हैं। बंगाल अब दीदी के आंसुओं पर नहीं, बल्कि भाजपा के परिवर्तन के नारों पर झूम रहा है।
क्या आपको लगता है कि ममता बनर्जी की यह हार भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों के अंत की शुरुआत है?