क्या भारत भी जिम्बाब्वे की राह पर है? मुफ्त की राजनीति और आर्थिक तबाही का सच

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कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया और विदेशी चैनलों पर एक वीडियो खूब वायरल हुआ था, जिसे देखकर हंसी भी आती है और डर भी लगता है। वीडियो में जिम्बाब्वे का एक लड़का बोरी भर के नोट लेकर दुकान पर सिर्फ एक चॉकलेट खरीदने पहुँचा है।

यह सुनने में किसी कॉमेडी फिल्म का सीन लग सकता है, लेकिन यह एक देश की बर्बादी की वो दास्तान है जिसे ‘मुफ्तखोरी की राजनीति’ ने लिखा है।

सत्ता का लालच और जिम्बाब्वे का पतन

जिम्बाब्वे के शासकों ने सोचा कि सत्ता में बने रहने का सबसे आसान तरीका है—जनता को सब कुछ मुफ्त दे दो। उन्होंने लोकलुभावन वादों की झड़ी लगा दी:

  • हर नागरिक को हर महीने 10,000 जिम्बाब्वे करेंसी बांटना।
  • किसानों को एमएसपी (MSP) की अंधी गारंटी।
  • मजदूरों को बिना किसी बजट प्रावधान के भारी-भरकम पेंशन।

नतीजा?

शुरुआती तीन महीने तो जनता को लगा कि स्वर्ग धरती पर आ गया है। लेकिन चौथे महीने से हकीकत सामने आने लगी। जब बाजार में सामान कम और नोटों की बाढ़ ज्यादा हो गई, तो मुद्रा (Currency) की कीमत कौड़ियों के बराबर रह गई। आज वहां सड़कों पर नोट कचरे की तरह बिखरे मिलते हैं।

₹5 की चॉकलेट और दो बोरी नोट

आज जिम्बाब्वे की महंगाई (Hyperinflation) का आलम यह है कि यदि आप भारत में मिलने वाली मामूली ₹5 वाली कैडबरी चॉकलेट खरीदना चाहें, तो आपको दो बोरों में भरकर वहां की करेंसी ले जानी पड़ेगी। स्थिति इतनी भयावह हो गई कि सरकार को 10 मिलियन और 50 मिलियन जैसे बड़े नोट छापने पड़े, जिनकी असल कीमत एक ब्रेड के टुकड़े से भी कम है।

चेतावनी: जब अर्थव्यवस्था उत्पादन (Production) के बजाय सिर्फ नोट छापने और बांटने पर टिकी होती है, तो वह ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है।

भारत के संदर्भ में एक गंभीर सबक

आज भारत में भी कुछ ऐसी ही ताकतें सक्रिय हैं जो देश को इसी ‘जिम्बाब्वे मॉडल’ पर धकेलना चाहती हैं। जॉर्ज सोरोस जैसे विदेशी एजेंडे से प्रेरित कुछ तत्व और ‘फर्जी किसान’ आंदोलन के नाम पर देश की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डालने की मांग कर रहे हैं।

मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी और बिना सोचे-समझे दी जाने वाली गारंटियों का लालच सुनने में मीठा लगता है, लेकिन इसका अंत जिम्बाब्वे जैसा ही होता है। यदि हम आज नहीं संभले और आर्थिक अनुशासन (Economic Discipline) को महत्व नहीं दिया, तो अगली पीढ़ी को चॉकलेट खरीदने के लिए भी बोरियों की जरूरत पड़ सकती है।

हमें यह तय करना होगा कि हमें एक सशक्त और आत्मनिर्भर भारत चाहिए, या ‘रेवड़ी संस्कृति’ वाला कंगाल देश।

क्या आपको लगता है कि भारत में बढ़ती ‘फ्रीबीज’ की राजनीति हमारे भविष्य के लिए खतरा है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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