इंसानियत दिखाने की सजा सिर्फ मौत? फारबिसगंज की बुजदिली बनाम फुलपरास की हिम्मत का खौफनाक अंत!

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Jitendra Yadav Murder Case Sugapatti Phulparas Madhubani

मधुबनी (फुलपरास): बिहार के समाज में आज एक बहुत बड़ा और कड़वा सवाल खड़ा हो गया है—क्या किसी की जान बचाना या मदद के लिए आगे बढ़ना अपनी मौत को दावत देना है? अभी दो दिन पहले फारबिसगंज की उस वीडियो ने देशभर को झकझोर दिया था, जहाँ लोग एक युवक का सिर कटते हुए देख रहे थे और मोबाइल से वीडियो बना रहे थे। तब हर तरफ से आवाज आई कि इंसानियत मर चुकी है। लेकिन शनिवार शाम मधुबनी के फुलपरास में जो हुआ, उसने बता दिया कि अगर इंसानियत जिंदा रहती है, तो उसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है।

क्या है सुगापट्टी की पूरी घटना?

मामला फुलपरास थाना क्षेत्र के सुगापट्टी का है। यहाँ के भारती चौक (ग्रामीण हाट) पर दो गुटों के बीच विवाद हो रहा था। माहौल गरमाता देख 40 वर्षीय जितेंद्र यादव ने एक जागरूक नागरिक और पड़ोसी का धर्म निभाने की सोची। वे बीच-बचाव करने पहुँचे ताकि झगड़ा शांत हो सके। लेकिन अपराधियों को उनकी यह इंसानियत रास नहीं आई।

आरोप है कि अपराधियों ने बीच-बचाव कर रहे जितेंद्र को ही निशाना बनाया और उनके मासूम बेटे के सामने ही उनकी कनपटी पर पिस्टल सटाकर गोली मार दी। जितेंद्र की मौके पर ही मौत हो गई।

फारबिसगंज बनाम फुलपरास: समाज के सामने धर्मसंकट

यह घटना सिर्फ एक हत्या नहीं, बल्कि उस भरोसे का कत्ल है जो समाज को जोड़कर रखता है।

  • फारबिसगंज की घटना: लोग मूकदर्शक बने रहे क्योंकि उन्हें अपनी जान का डर था। पूरे देश ने उन्हें बुजदिल कहा।
  • फुलपरास की घटना: यहाँ जितेंद्र यादव ने हिम्मत दिखाई, बुजदिल नहीं बने और मदद के लिए आगे आए। नतीजा? उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

ऐसे में सवाल उठता है कि आम आदमी क्या करे? अगर वह मदद न करे तो ‘पत्थर दिल’ और अगर मदद के लिए बढ़े तो अपराधियों का अगला शिकार

अनाथ हुए चार बच्चे, कौन है जिम्मेदार?

दिल्ली में मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालने वाले जितेंद्र यादव अपने पीछे पत्नी और चार नाबालिग बच्चों को छोड़ गए हैं। परिजनों ने नीतीश और सरोज नामक व्यक्तियों पर इस जघन्य हत्याकांड का आरोप लगाया है। पुलिस मामले की जांच कर रही है और छापेमारी जारी है, लेकिन क्या पुलिस की ये कार्रवाई जितेंद्र के बच्चों को उनका पिता लौटा पाएगी?

दम तोड़ती व्यवस्था और बढ़ता डर

सुगापट्टी की इस वारदात ने अपराधियों के मन से कानून का खौफ पूरी तरह खत्म होने की पुष्टि कर दी है। जब बीच-बचाव करने वाले ही सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो समाज में मदद शब्द लुप्त हो जाएगा। यह घटना हमारे सिस्टम और पुलिस प्रशासन के लिए एक खुली चुनौती है

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