बिहार प्रशासनिक हलचल: पदभार संभालने के चंद दिनों बाद ही BSSC अध्यक्ष आलोक राज का इस्तीफा

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बिहार की प्रशासनिक गलियारे से एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) और 1989 बैच के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी आलोक राज ने बिहार कर्मचारी चयन आयोग (BSSC) के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है।

हैरानी की बात यह है कि उन्होंने यह जिम्मेदारी संभाली अभी जुम्मा-जुम्मा आठ दिन भी नहीं हुए थे। इस अचानक आए फैसले ने राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे दिया है।

नियुक्ति से इस्तीफे तक का सफर

आलोक राज 31 दिसंबर 2025 को बिहार के डीजीपी पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी कार्यक्षमता और अनुभव को देखते हुए बिहार सरकार ने उन्हें रिटायरमेंट के अगले ही दिन, यानी 1 जनवरी 2026 से BSSC के नए अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया था।

  • नियुक्ति तिथि: 1 जनवरी 2026
  • कार्यकाल: 5 वर्ष के लिए प्रस्तावित​
  • इस्तीफा: पदभार ग्रहण करने के मात्र 2 से 5 दिनों के भीतर

इस्तीफे का कारण: निजी या कुछ और?

विभिन्न समाचार स्रोतों के अनुसार, आलोक राज ने अपना इस्तीफा सामान्य प्रशासन विभाग को सौंप दिया है। आधिकारिक तौर पर उन्होंने “निजी कारणों” का हवाला देते हुए पद छोड़ने की बात कही है। हालांकि, इतनी जल्दी इस्तीफा देने के फैसले ने सबको सोच में डाल दिया है कि क्या इसके पीछे कोई अन्य प्रशासनिक दबाव या तालमेल की कमी रही है।

कौन हैं आलोक राज?

आलोक राज बिहार कैडर के 1989 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं। पुलिस सेवा के दौरान उनकी छवि एक सुलझे हुए और कड़क अधिकारी की रही है। डीजीपी के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने राज्य की कानून व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण सुधार किए थे। यही कारण था कि सरकार ने युवाओं के भविष्य से जुड़े ‘बिहार कर्मचारी चयन आयोग’ जैसी महत्वपूर्ण संस्था की कमान उन्हें सौंपी थी।

अब आगे क्या?

  • नई नियुक्ति: अब बिहार सरकार को जल्द से जल्द एक नए और विश्वसनीय चेहरे की तलाश करनी होगी।​
  • अभ्यर्थियों की चिंता: लाखों छात्र जो BSSC परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, उनके मन में नियुक्तियों की पारदर्शिता और गति को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

नोट: फिलहाल सरकार की ओर से नए अध्यक्ष के नाम की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

​क्या आपको लगता है कि प्रशासनिक अधिकारियों का राजनीति या आयोगों में जाना सही है? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

बिहार में भूमि विवादों का होगा अंत: डिप्टी सीएम विजय सिन्हा ने जारी किया हेल्पलाइन नंबर, दलालों पर कसेगा शिकंजा

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बिहार में भूमि संबंधी समस्याओं और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए राज्य सरकार ने एक बड़ी पहल की है। ‘भूमि सुधार जनकल्याण संवाद’ कार्यक्रम के माध्यम से उपमुख्यमंत्री सह राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा सीधे आम जनता से जुड़ रहे हैं। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य भूमि विवादों का त्वरित निपटारा करना और विभाग में सक्रिय दलालों के प्रभाव को पूरी तरह समाप्त करना है।

जन-संवाद के जरिए समाधान की कोशिश

हाल ही में भागलपुर, सहरसा और अन्य जिलों में आयोजित जन-संवाद कार्यक्रमों में मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने स्पष्ट किया कि सरकार की प्राथमिकता पारदर्शिता लाना है। उन्होंने कहा कि अक्सर आम नागरिक म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) और जमाबंदी जैसे कार्यों के लिए बिचौलियों के चक्कर में फंस जाते हैं, जिसे अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

शिकायत के लिए जारी हुआ टॉल-फ्री नंबर

आम जनता की सहूलियत के लिए राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने एक विशेष हेल्पलाइन नंबर जारी किया है। नागरिक अब घर बैठे अपनी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं:

  • टॉल-फ्री हेल्पलाइन नंबर: 1800-345-6215​
  • किन समस्याओं के लिए करें कॉल: दाखिल-खारिज (Mutation) में देरी।
    • जमाबंदी (Jamabandi) में सुधार।​
    • भूमि मापी और सीमा विवाद।​
    • राजस्व कर्मियों या बिचौलियों द्वारा अवैध मांग।

कैसे काम करेगी यह व्यवस्था?

यह हेल्पलाइन नंबर पहले से ही अस्तित्व में था, लेकिन अब इसे विशेष रूप से प्रचारित किया जा रहा है ताकि अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक इसकी जानकारी पहुँच सके।

  • ऑनलाइन पंजीकरण: जैसे ही कोई नागरिक हेल्पलाइन पर कॉल करता है, उसकी शिकायत डिजिटल पोर्टल पर दर्ज हो जाती है।​
  • त्वरित कार्रवाई: शिकायत दर्ज होने के बाद संबंधित जिले के अधिकारियों को ऑनलाइन निर्देश भेजे जाते हैं।​
  • ट्रैकिंग: शिकायतकर्ता अपनी शिकायत की स्थिति (Status) को ट्रैक कर सकते हैं, जिससे जवाबदेही सुनिश्चित होती है।

दलालों पर अंकुश और पारदर्शिता

​मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने चेतावनी दी है कि जो भी कर्मचारी या बिचौलिया आम जनता को परेशान करेगा, उस पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। ऑनलाइन सिस्टम और हेल्पलाइन के सक्रिय होने से:

  • कार्यालयों के चक्कर लगाने की जरूरत कम होगी।​
  • भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी पर लगाम लगेगी।​
  • लंबित मामलों का तेजी से निपटारा होगा।

मंत्री का संदेश: “भूमि सुधार विभाग अब जनता के द्वार पर है। हमारा लक्ष्य है कि किसी भी गरीब या लाचार व्यक्ति की जमीन पर कोई भू-माफिया नजर न डाल सके और सरकारी प्रक्रियाएं सरल व पारदर्शी हों।”

बिहार सरकार की यह पहल राज्य में भूमि विवादों के कारण होने वाली हिंसक घटनाओं को कम करने में मील का पत्थर साबित हो सकती है। यदि आप भी भूमि संबंधी किसी समस्या से जूझ रहे हैं, तो तुरंत 1800-345-6215 पर संपर्क करें।

IRCTC New Rules 2026: आधार लिंक नहीं है तो बुकिंग में होगी मुश्किल, जानें 5 और 12 जनवरी से क्या बदला?

IRCTC New Booking Rules 2026 के तहत आधार लिंक न होने पर सुबह 8 से शाम 4 बजे तक टिकट बुकिंग पर रोक से जुड़ी जानकारी

भारतीय रेलवे (Indian Railways) ने ऑनलाइन ट्रेन टिकट बुकिंग के नियमों में एक क्रांतिकारी बदलाव किया है। यदि आप अक्सर ट्रेन से यात्रा करते हैं और IRCTC के माध्यम से ऑनलाइन टिकट बुक करते हैं, तो यह खबर आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। रेलवे ने 5 जनवरी 2026 से आधार वेरिफिकेशन को लेकर नए प्रतिबंध लागू कर दिए हैं।

क्या है नया नियम? (IRCTC New Rule 2026)

रेलवे के नए आदेश के अनुसार, एडवांस रिजर्वेशन पीरियड (ARP) के पहले दिन यानी जब किसी ट्रेन की बुकिंग शुरू होती है (यात्रा से 60 दिन पहले), उस दिन बिना आधार लिंक वाले IRCTC अकाउंट से यात्री सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक ऑनलाइन टिकट बुक नहीं कर पाएंगे।

यह नियम उन यात्रियों के लिए है जो ऑनलाइन वेबसाइट या मोबाइल ऐप के जरिए टिकट बुक करते हैं। हालांकि, रेलवे काउंटर (PRS) से टिकट बुक करने के नियमों में फिलहाल कोई बदलाव नहीं किया गया है।

तीन चरणों में लागू हो रही है व्यवस्था

रेलवे इस नई व्यवस्था को चरणबद्ध तरीके से लागू कर रहा है ताकि यात्रियों को अचानक परेशानी न हो:

  1. पहला चरण (29 दिसंबर 2025): सुबह 8 बजे से दोपहर 12 बजे तक केवल आधार-वेरिफाइड अकाउंट ही टिकट बुक कर सकते थे।
  2. दूसरा चरण (5 जनवरी 2026): अब यह समय सीमा बढ़ाकर शाम 4 बजे तक कर दी गई है।
  3. तीसरा चरण (12 जनवरी 2026): 12 जनवरी से यह प्रतिबंध और कड़ा हो जाएगा। इसके बाद बिना आधार लिंक वाले यात्री पूरे दिन (सुबह 8 से रात 12 बजे तक) बुकिंग नहीं कर पाएंगे।

क्यों लिया गया यह फैसला?

रेलवे का मुख्य उद्देश्य टिकट दलालों (Touts) और अवैध सॉफ्टवेयर के जरिए होने वाली बल्क बुकिंग पर लगाम कसना है। अक्सर देखा जाता है कि बुकिंग खुलते ही दलाल फर्जी आईडी के जरिए चंद सेकंड में सारी कन्फर्म सीटें बुक कर लेते हैं। आधार वेरिफिकेशन अनिवार्य होने से:

  • नकली और फर्जी IRCTC अकाउंट्स पर रोक लगेगी।
  • आम और असली यात्रियों को कन्फर्म टिकट मिलने की संभावना बढ़ेगी।
  • सिस्टम में पारदर्शिता आएगी।

कैसे करें IRCTC अकाउंट को आधार से लिंक? (Step-by-Step Guide)

अगर आपने अभी तक अपना अकाउंट लिंक नहीं किया है, तो इन आसान स्टेप्स को फॉलो करें:

  • Step 1: IRCTC की आधिकारिक वेबसाइट (irctc.co.in) पर लॉग इन करें।
  • Step 2: ‘My Account’ टैब पर जाएं और ‘Link Your Aadhaar’ विकल्प को चुनें।
  • Step 3: अपना आधार नंबर और नाम दर्ज करें (जो आधार कार्ड पर है)।
  • Step 4: आपके आधार से रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर एक OTP आएगा, उसे दर्ज करें।
  • Step 5: वेरिफिकेशन पूरा होने के बाद आपका अकाउंट आधार से लिंक हो जाएगा।

प्रो टिप: आधार लिंक करने के बाद आप एक महीने में 24 टिकट तक बुक कर सकते हैं, जबकि बिना आधार वाले यूजर केवल 12 टिकट ही बुक कर पाते हैं।

क्रिकेट का कोल्ड वॉर: बांग्लादेश ने क्यों किया भारत में T20 वर्ल्ड कप खेलने से इंकार?

भारत और बांग्लादेश के क्रिकेट खिलाड़ियों की प्रतीकात्मक तस्वीर, T20 वर्ल्ड कप विवाद और दोनों देशों के बीच तनाव को दर्शाती हुई

खेल और राजनीति के बीच का तनाव अब एक नए चरम पर पहुँच गया है। जो विवाद आईपीएल (IPL) के एक ऑक्शन से शुरू हुआ था, उसने अब एक बड़े कूटनीतिक विवाद का रूप ले लिया है। आलम यह है कि बांग्लादेश ने अब आईसीसी (ICC) से T20 वर्ल्ड कप के अपने मैचों को भारत से बाहर शिफ्ट करने की मांग कर दी है।

लेकिन एक खिलाड़ी की बोली से शुरू हुआ यह मामला टीम के बहिष्कार तक कैसे पहुँचा? आइए विस्तार से समझते हैं।

1. विवाद की जड़: मुस्तफ़िज़ुर रहमान और IPL ऑक्शन

विवाद की शुरुआत 2026 के टाटा आईपीएल (TATA IPL) ऑक्शन के दौरान हुई। शाहरुख खान की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) ने बांग्लादेशी तेज़ गेंदबाज मुस्तफ़िज़ुर रहमान को 9 करोड़ 20 लाख रुपये में खरीदा।

जैसे ही यह खबर बाहर आई, भारत में इसका कड़ा विरोध शुरू हो गया। सोशल मीडिया पर लोगों ने सवाल उठाए कि जब बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों (हिंदुओं) पर अत्याचार की खबरें आ रही हैं, तो ऐसे समय में एक भारतीय फ्रैंचाइज़ी बांग्लादेशी खिलाड़ी पर करोड़ों रुपये क्यों खर्च कर रही है?

2. BCCI का दखल और KKR का पीछे हटना

जनता और कई धार्मिक गुरुओं के भारी विरोध को देखते हुए BCCI ने इसमें हस्तक्षेप किया। रिपोर्ट्स के अनुसार, बोर्ड ने KKR से इस खिलाड़ी को टीम से बाहर करने को कहा और फ्रेंचाइजी को दूसरे खिलाड़ी के चयन के लिए दोबारा मौका देने का भरोसा दिया। अंततः मुस्तफ़िज़ुर को टीम से हटा दिया गया।

3. बांग्लादेश की तीखी प्रतिक्रिया: “गुलामी के दिन अब लद गए”

खिलाड़ी को हटाए जाने के फैसले ने ढाका में राजनीतिक उबाल पैदा कर दिया। बांग्लादेश के खेल सलाहकार (Sports Advisor) आसिफ नज़रुल ने इसे बांग्लादेश का अपमान बताया। उनके बयान के मुख्य बिंदु थे:

  • वर्ल्ड कप का बहिष्कार: नज़रुल ने घोषणा की कि सुरक्षा कारणों और भारत की “सांप्रदायिक नीतियों” के चलते बांग्लादेश की टीम वर्ल्ड कप खेलने भारत नहीं आएगी।
  • IPL पर बैन की धमकी: उन्होंने बांग्लादेश में आईपीएल के मैचों के प्रसारण पर भी रोक लगाने की बात कही।
  • सम्मान की लड़ाई: उन्होंने कहा कि बांग्लादेश अब किसी भी कीमत पर अपने खिलाड़ियों का अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा।

“अब वो दिन बीत गए जब हम झुक कर रहते थे। भारत के क्रिकेट बोर्ड का रवैया स्वीकार करने योग्य नहीं है।”आसिफ नज़रुल

4. कोलकाता कनेक्शन: क्या यह कोई सोची-समझी योजना थी?

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात शेड्यूल की थी। बांग्लादेश के वर्ल्ड कप में चार मैच होने थे, जिनमें से तीन मैच कोलकाता के ईडन गार्डन्स में रखे गए थे।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक व्यावसायिक रणनीति थी। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की सांस्कृतिक निकटता के कारण इन मैचों में भारी भीड़ उमड़ने की उम्मीद थी। लेकिन अब यही मैच विवाद का केंद्र बन गए हैं।

5. कूटनीति और क्रिकेट का भविष्य

यह घटना दक्षिण एशिया में क्रिकेट के भविष्य पर कई सवाल खड़े करती है:

  • हाइब्रिड मॉडल: क्या अब पाकिस्तान की तरह बांग्लादेश के मैच भी श्रीलंका या यूएई जैसे तटस्थ स्थानों (Neutral Venues) पर होंगे?
  • BCCI की भूमिका: क्या BCCI एक प्राइवेट कंपनी की तरह काम कर रही है या उसे देश की भावनाओं का ख्याल रखना चाहिए?

निष्कर्ष:

फिलहाल, T20 वर्ल्ड कप का भविष्य अधर में लटका हुआ है। यदि बांग्लादेश की टीम भारत आने से मना करती है, तो आईसीसी के लिए यह एक बड़ी सिरदर्दी बन जाएगा।

आपकी इस बारे में क्या राय है? क्या खेल को राजनीति से पूरी तरह अलग रखना चाहिए, या पड़ोसी देशों के साथ तनाव के बीच ऐसे कड़े फैसले लेना ज़रूरी है?

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शिवसेना का अनसुना इतिहास: क्या हिंदुत्व नहीं, इंदिरा गांधी की ‘रणनीति’ थी इसके जन्म की वजह?

इंदिरा गांधी और बालासाहेब ठाकरे की ऐतिहासिक तस्वीर, शिवसेना के जन्म की राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़ी

हाल ही में नवाब मलिक का एक बयान चर्चा में रहा, जिसमें उन्होंने दावा किया कि “शिवसेना का जन्म हिंदुत्व के लिए नहीं हुआ था और ना ही शिवसेना कभी मूल रूप से हिंदुत्ववादी रही।” यह बयान कई लोगों को चौंका सकता है, लेकिन अगर हम 60 और 70 के दशक के मुंबई के इतिहास के पन्नों को पलटें, तो यह दावा सिर्फ राजनीति नहीं, बल्कि एक कड़वी हकीकत के करीब नजर आता है।

आइये जानते हैं कि आखिर शिवसेना के गठन के पीछे की असली कहानी क्या थी।

1. इंदिरा गांधी और मुंबई की ट्रेड यूनियंस की चुनौती

शिवसेना के उदय को समझने के लिए हमें उस दौर की मुंबई को समझना होगा। इंदिरा गांधी के शासनकाल में मुंबई देश के सबसे बड़े मजदूर आंदोलनों का गढ़ बन चुका था।

  • हड़तालों का दौर: रेलवे से लेकर परिवहन और बिजली विभाग तक, सब कुछ ठप हो जाता था।
  • बड़े नेता: शंकर गुहा नियोगी से लेकर जॉर्ज फर्नांडिस जैसे कद्दावर नेता इन यूनियनों का नेतृत्व कर रहे थे।
  • महिला आंदोलन: उसी दौर में ‘पानी वाली बाई’ के नाम से मशहूर मृणाल गोरे ने पानी को लेकर इतना बड़ा आंदोलन किया, जिसे आजाद भारत का सबसे बड़ा महिला आंदोलन माना जाता है।

2. ‘क्षेत्रवाद’ का बीज: हड़ताल तोड़ने का हथियार

इंदिरा गांधी ने एक महत्वपूर्ण बात नोटिस की— इन हड़तालों में शामिल होने वाले मजदूर सिर्फ ‘भारतीय’ होते थे। वहां कोई मराठी, बिहारी या दक्षिण भारतीय नहीं था, सब एक थे। हड़तालों से निपटने और जॉर्ज फर्नांडिस जैसे नेताओं (जिन्हें ‘बाहरी’ माना जा सकता था) की पैठ को तोड़ने के लिए कांग्रेस को एक ‘लोकल’ शक्ति की जरूरत थी।

रणनीति: अगर महाराष्ट्र में ‘क्षेत्रवाद’ (Regionalism) का बीज बो दिया जाए, तो यूनियनों की एकता टूट जाएगी।

3. बाल ठाकरे और ‘बजाओ पुंगी, भगाओ लुंगी’

यहीं से बाल ठाकरे का उदय हुआ। आरोप है कि इंदिरा गांधी के बढ़ावा देने पर बाल ठाकरे ने मुंबई की मजदूर एकता को तोड़ने का काम किया। उन्होंने बड़ी चालाकी से आंदोलन का रुख ‘पूंजीपतियों के खिलाफ’ से मोड़कर ‘बाहरी लोगों के खिलाफ’ कर दिया।

बाल ठाकरे ने अपनी रणनीति बहुत संभलकर बनाई:

  1. पहला निशाना (दक्षिण भारतीय): उन्होंने शेट्टी और अन्य दक्षिण भारतीयों के खिलाफ “बजाओ पुंगी, भगाओ लुंगी” का नारा दिया। शिवसेना के लोग दक्षिण भारतीयों को निशाना बनाने लगे।
  2. दूसरा निशाना (उत्तर भारतीय): जब दक्षिण भारतीयों का मुद्दा ठंडा हुआ, तो रुख उत्तर भारतीयों की तरफ मोड़ा गया।
  3. तीसरा निशाना (गुजराती): अंत में गुजरातियों के खिलाफ भी मोर्चा खोला गया।

यह सब एक साथ नहीं किया गया, क्योंकि अगर सभी ‘बाहरी’ एक साथ हो जाते तो शिवसेना का टिकना मुश्किल था। यह ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का एक क्लासिक उदाहरण था।

4. इमरजेंसी और शिवसेना का रुख

जो लोग आज शिवसेना को कांग्रेस विरोधी मानते हैं, उन्हें यह जानकर हैरानी होगी कि जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी (आपातकाल) लगाई थी, तब बाल ठाकरे और शिवसेना पूरी मजबूती के साथ इंदिरा गांधी के समर्थन में खड़ी थी। यह ठीक वैसा ही पैटर्न था जैसा पंजाब में भिंडरावाले या नागालैंड में अन्य गुटों के साथ देखा गया— पहले राजनीतिक फायदे के लिए किसी शक्ति को खड़ा करना और बाद में उसे अपने हाल पर छोड़ देना।

निष्कर्ष:

इतिहास गवाह है कि राजनीतिक दल अक्सर अपनी सुविधा के अनुसार विचारधारा बदलते हैं। नवाब मलिक का यह कहना कि शिवसेना का जन्म हिंदुत्व के लिए नहीं हुआ था, उस दौर की घटनाओं और कांग्रेस के साथ शिवसेना के शुरुआती समीकरणों को देखते हुए तथ्यपरक लगता है। शिवसेना ने हिंदुत्व का झंडा तब उठाया जब मुंबई में कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट यूनियनों का सफाया हो गया और उसे एक नई पहचान की जरूरत थी।

Disclaimer (अस्वीकरण): इस लेख में व्यक्त किए गए विचार पूरी तरह से लेखक के अपने हैं और यह नवाब मलिक के हालिया बयानों और उपलब्ध ऐतिहासिक घटनाओं के विश्लेषण पर आधारित है। इस लेख का उद्देश्य किसी भी राजनीतिक दल, समुदाय, व्यक्ति या समूह की भावनाओं को आहत करना या उनकी छवि खराब करना नहीं है, बल्कि राजनीतिक इतिहास के एक विशेष दृष्टिकोण को प्रस्तुत करना है। पाठकों से अनुरोध है कि वे तथ्यों की अपने स्तर पर भी पुष्टि कर लें। यह ब्लॉग किसी भी दावे की सत्यता की 100% गारंटी नहीं लेता।

नागिन घर-घर के: नई मैथिली फिल्म यूट्यूब पर रिलीज, जानें स्टार कास्ट और पूरी जानकारी

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मैथिली सिनेमा के दर्शकों के लिए आज का दिन बेहद खास है। बहुप्रतीक्षित मैथिली फिल्म “नागिन घर-घर के” (Nagin Ghar Ghar Ke) अब आधिकारिक तौर पर यूट्यूब पर रिलीज हो गई है। यह फिल्म ‘ग्रीन लीफ मोशन पिक्चर्स’ के बैनर तले तैयार की गई है और इसे पारिवारिक ड्रामा श्रेणी में एक बड़ी फिल्म माना जा रहा है।

फिल्म की कहानी और मुख्य विषय

​”नागिन घर-घर के” महज एक फिल्म नहीं, बल्कि हर मध्यवर्गीय परिवार की एक झलक है। फिल्म की कहानी मुखिया महेश यादव के परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है। कहानी में मोड़ तब आता है जब घर की शांति संपत्ति के बंटवारे और आपसी कलह की भेंट चढ़ने लगती है।

फिल्म का शीर्षक ‘नागिन’ प्रतीकात्मक रूप से घर में पनपने वाली ईर्ष्या और नफरत को दर्शाता है, जो हंसते-खेलते परिवार को जहर की तरह डस लेती है।

फिल्म की मुख्य कास्ट और क्रू (Cast & Crew)

फिल्म की सफलता के पीछे एक बड़ी टीम का हाथ है, जिसकी पूरी जानकारी यहाँ दी गई है:

  • मुख्य कलाकार: फिल्म में सोनू राज, सोनू झा, सुधांशु सिंह, पूजा सिंह, तुलिका भारती, रूपा सिंह, रूपेश चंद यादव(पूर्व प्रखंड प्रमुख, फूलपुरास) और आरती जैसे कलाकारों ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं।
  • निर्देशक: अभिषेक रंजन।
  • निर्माता: राज कुमार राजा।
  • ​लेखक: भरत प्रसाद गुप्ता और राज कुमार राजा।
  • संगीत: ब्रजेश भारती और रोहित भास्कर।
  • ​गीतकार: देव कृष्ण यादव।
  • ​गायक: कुंज बिहारी मिश्र, सन्नू कुमार, राजीव रंजन, कल्पना मंडल, नेहा झा, टी प्रणव प्रियंक और देव कृष्ण यादव।

तकनीकी टीम

  • पटकथा और संवाद: सोनू राज और रवि रोशन।
  • ​संपादक: शिव थारू।
  • ​कोरियोग्राफर: विक्रांत कुमार।
  • ​बैकग्राउंड म्यूजिक: शिवम लाल यादव.​साउंड इंजीनियर: पीयूष प्रभाकर।

फिल्म की कहानी का सार

​”नागिन घर-घर के” एक सशक्त पारिवारिक कहानी है जो घर-घर की समस्याओं, रिश्तों में आती कड़वाहट और फिर उनके समाधान को दर्शाती है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे छोटे-छोटे विवाद एक खुशहाल परिवार के लिए ‘नागिन’ की तरह घातक साबित होते हैं और अंततः संस्कारों की जीत होती है।

फिल्म कहाँ देखें?

यह फिल्म अब ‘Bharti Series’ के यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है। आप इसे मुफ्त में देख सकते हैं और मैथिली सिनेमा का समर्थन कर सकते हैं।

यह फिल्म अब ‘Bharti Series’ के यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है। आप इसे मुफ्त में देख सकते हैं और मैथिली सिनेमा का समर्थन कर सकते हैं।

फिल्म देखने के लिए यहाँ क्लिक करें: नागिन घर-घर के – Full Movie

फिल्म ‘उत्सव’ का अनसुना किस्सा: जब रेखा के घर पड़ी थी रेड, फिर भी जारी रखी थी शेखर सुमन के साथ शूटिंग

फिल्म उत्सव का अनसुना किस्सा

1984 में आई फिल्म ‘उत्सव’ न केवल अपनी बोल्डनेस बल्कि अपने कलाकारों के समर्पण के लिए भी चर्चा में रही थी। इसी फिल्म से शेखर सुमन ने बॉलीवुड में कदम रखा था। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान शेखर सुमन ने फिल्म के सेट से जुड़ी कुछ ऐसी यादें साझा कीं, जो रेखा के प्रोफेशनलिज्म की एक नई मिसाल पेश करती हैं।

शूटिंग के पहले ही दिन आ गई थी बड़ी मुसीबत

शेखर सुमन ने बताया कि जब फिल्म की शूटिंग का पहला दिन था, तभी खबर आई कि रेखा के घर पर इनकम टैक्स की रेड पड़ी है। आमतौर पर ऐसा होने पर कोई भी कलाकार घबराकर शूटिंग छोड़ देता, लेकिन रेखा ने ऐसा नहीं किया।

“मुझे लगा था मेरा करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगा, लेकिन रेखा ने शांति से कहा कि उन्हें अपना काम करने दो, मैं यहाँ अपना काम पूरा करूँगी।” – शेखर सुमन

इंटिमेट सीन्स पर रेखा का नजरिया

फिल्म में शेखर सुमन और रेखा के बीच कई कामुक और इंटिमेट सीन फिल्माए गए थे। शेखर सुमन के अनुसार:

  • रेखा ने कभी भी इन सीन्स को लेकर कोई शिकायत नहीं की।
  • वह अन्य अभिनेत्रियों की तरह नखरे नहीं दिखाती थीं।
  • उन्होंने अपनी भूमिका की मांग को समझा और उसे पूरी सहजता के साथ निभाया।

फिल्म की शानदार स्टारकास्ट

गिरीश कर्नाड द्वारा निर्देशित इस फिल्म में केवल रेखा और शेखर सुमन ही नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के दिग्गज कलाकारों की फौज थी:

  • शशि कपूर
  • अमजद खान
  • अनुपम खेर
  • नीना गुप्ता

निष्कर्ष

शेखर सुमन आज भी रेखा के उस सहयोग और प्रोफेशनलिज्म के कायल हैं। उनके लिए रेखा केवल एक को-स्टार नहीं, बल्कि एक ऐसी प्रेरणा हैं जिन्होंने एक नए कलाकार के डेब्यू को बर्बाद होने से बचा लिया।

ऐसी ही बॉलीवुड की अनसुनी कहानियों और रोचक जानकारियों के लिए हमारे पेज को फॉलो करना न भूलें!

कश्मीरा शाह बर्थडे स्पेशल: शादीशुदा होने के बावजूद कृष्णा अभिषेक को दे बैठी थीं दिल, 14 बार प्रेग्नेंसी फेल होने के बाद ऐसे बनीं मां

कश्मीरा और कृष्णा अभिषेक की प्रेम कहानी

कश्मीरा और कृष्णा अभिषेक की प्रेम कहानी साल 2005 में शुरू हुई थी। उस समय वे फिल्म ‘पप्पू पास हो गया’ की शूटिंग के लिए जयपुर में थे।

  • पहली मुलाकात: दोनों की पहली मुलाकात जयपुर में हुई। उस समय कश्मीरा शादीशुदा थीं; उन्होंने साल 2001 में ब्रैड लिस्टरमैन से शादी की थी।
  • होटल का वो डिनर: कश्मीरा और कृष्णा अलग-अलग होटलों में ठहरे थे। एक फुर्सत के दिन कश्मीरा ने कृष्णा को डिनर पर बुलाया।
  • 11 घंटे की बातचीत: कश्मीरा के मुताबिक, उनके बीच एक अनकहा कनेक्शन था। रात 8 बजे शुरू हुई बातों का सिलसिला अगले दिन सुबह 7 बजे तब थमा, जब प्रोडक्शन टीम ने शूटिंग के लिए कॉल किया।

विवाद और तलाक: जब मीडिया में मचा बवाल

जयपुर से मुंबई लौटने के बाद भी दोनों का मिलना-जुलना जारी रहा। हालांकि, वे छुपकर मिलते थे, लेकिन जल्द ही मीडिया को इसकी भनक लग गई। कश्मीरा के शादीशुदा होने के कारण काफी विवाद हुआ।

आखिरकार, साल 2007 में कश्मीरा ने ब्रैड लिस्टरमैन से तलाक ले लिया। लोगों का मानना था कि कृष्णा की वजह से यह रिश्ता टूटा, लेकिन कश्मीरा का कहना था कि ब्रैड के साथ उनका रिश्ता पहले ही खराब दौर से गुजर रहा था।

लिव-इन से शादी और मां बनने का संघर्ष

तलाक के बाद कश्मीरा और कृष्णा लिव-इन रिलेशनशिप में रहने लगे और साल 2013 में दोनों ने शादी कर ली। लेकिन उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी चुनौती थी माता-पिता बनना।

“मां बनने के लिए कश्मीरा ने काफी दर्द सहा। उनकी प्रेग्नेंसी 14 बार फेल हुई। उन्होंने IVF तकनीक की भी मदद ली, लेकिन कामयाबी नहीं मिली।”

हार न मानते हुए, साल 2017 में सरोगेसी (Surrogacy) के जरिए कश्मीरा और कृष्णा दो जुड़वा बेटों के माता-पिता बने। आज वे अपनी छोटी सी दुनिया में बेहद खुश हैं।

करियर पर एक नज़र

  • डेब्यू: कश्मीरा शाह की पहली हिंदी फिल्म साल 1997 में आई ‘यस बॉस’ थी।
  • साउथ फिल्में: हिंदी फिल्मों से पहले उन्होंने साउथ की कुछ फिल्मों में आइटम नंबर्स किए थे।
  • टीवी: फिल्मों के साथ-साथ कश्मीरा ‘बिग बॉस’ जैसे रियलिटी शोज और अन्य टीवी सीरियल्स में भी सक्रिय रही हैं।

क्या आप कश्मीरा शाह और कृष्णा अभिषेक की इस लव स्टोरी के बारे में जानते थे? हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं!

समाज सेवा की मिसाल: जिला पार्षद चंद्रभूषण साह ने 1500 जरूरतमंदों के बीच किया कंबल वितरण

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मधुबनी: भीषण ठंड और शीतलहर के प्रकोप को देखते हुए मानवता की सेवा में एक बार फिर जिला पार्षद चंद्रभूषण शाह आगे आए हैं। मधुबनी जिले के खुंटौना प्रखंड (क्षेत्र संख्या 38) के वर्तमान जिला पार्षद चंद्रभूषण साह ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हुए इस वर्ष भी भारी संख्या में गरीब और असहाय लोगों के बीच कंबल का वितरण किया।

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8 वर्षों से निरंतर जारी है सेवा का संकल्प

चंद्रभूषण शाह पिछले 8 सालों से लगातार समाज के अंतिम पायदान पर खड़े लोगों की मदद करते आ रहे हैं। इस वर्ष भी उन्होंने क्षेत्र के लगभग 1500 गरीब, वृद्ध और असहाय लोगों को चिन्हित कर उन्हें कंबल भेंट किए।

वितरण कार्यक्रम के दौरान जिला पार्षद ने कहा कि “गरीबों की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। कड़ाके की ठंड में किसी जरूरतमंद को राहत पहुँचाना आत्मिक शांति देता है।” उन्होंने यह भी संकल्प दोहराया कि क्षेत्र के विकास के साथ-साथ वह व्यक्तिगत स्तर पर भी लोगों के दुख-सुख में हमेशा खड़े रहेंगे।

स्थानीय लोगों ने की सराहना

खुंटौना प्रखंड के ग्रामीणों ने पार्षद के इस कार्य की भूरी-भूरी प्रशंसा की। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब भी क्षेत्र में कोई आपदा या कठिन समय आता है, चंद्रभूषण शाह बिना किसी भेदभाव के लोगों की मदद के लिए तैयार रहते हैं।

इस अवसर पर जिला पार्षद आरती सहित कई स्थानीय प्रतिनिधि और गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे, जिन्होंने इस नेक पहल की सराहना की।

मुख्य हाइलाइट्स:

  • स्थान: खुंटौना प्रखंड, क्षेत्र संख्या 38 (मधुबनी)।
  • सेवा का रिकॉर्ड: पिछले 8 वर्षों से निरंतर जारी।
  • कुल लाभार्थी: इस वर्ष 1500 से अधिक लोगों को मिली राहत।
  • आयोजक: जिला पार्षद चंद्रभूषण साह।

मधुबनी पुलिस हुई हाई-टेक: SP ने किया मोबाइल FSL वैन का निरीक्षण, अब मौके पर ही होगी वैज्ञानिक जांच

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मधुबनी: जिले में अपराध नियंत्रण और कांडों के त्वरित निष्पादन (Disposal) की दिशा में मधुबनी पुलिस ने एक और बड़ा कदम बढ़ाया है। अब आपराधिक वारदातों के बाद फॉरेंसिक जांच के लिए लंबी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। मधुबनी पुलिस के बेड़े में अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस ‘चलंत विधि विज्ञान प्रयोगशाला’ (Mobile Forensic Science Laboratory) शामिल हो गई है।

शनिवार को मधुबनी के पुलिस अधीक्षक (SP) योगेंद्र कुमार ने पुलिस केंद्र परिसर में इस नई वैन का बारीकी से निरीक्षण किया और इसकी कार्यप्रणाली को समझा।

​SP ने जांची वैन की तकनीकी खूबियां:

एसपी योगेंद्र कुमार ने वैन के अंदर मौजूद फॉरेंसिक किट्स और उपकरणों का जायजा लिया। उन्होंने बताया कि यह वाहन आधुनिक तकनीक से लैस है। इसमें घटना स्थल से ही साक्ष्य (Evidence) जुटाने की पूरी व्यवस्था है।

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वैन की मुख्य विशेषताएं:

  • ब्लड सैम्पल कलेक्शन: खून के धब्बों की जांच और नमूने लेने की किट।
  • फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट: उंगलियों के निशान उठाने और सुरक्षित रखने के उपकरण।
  • DNA टेस्टिंग किट: जैविक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था।
  • क्राइम सीन फोटोग्राफी: घटनास्थल की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी के लिए हाई-टेक कैमरे।

​अब अपराधियों का बचना होगा मुश्किल:

​अब तक, किसी बड़ी घटना (जैसे हत्या, लूट, या डकैती) के बाद फॉरेंसिक टीम को मुजफ्फरपुर या पटना से बुलाना पड़ता था, जिससे साक्ष्य मिटने का खतरा रहता था और समय भी बर्बाद होता था।

इस मोबाइल वैन के आने से:

  1. ​घटना के तुरंत बाद पुलिस टीम मौके पर पहुंचकर वैज्ञानिक साक्ष्य जुटा सकेगी।
  2. कोर्ट में पुख्ता सबूत पेश किए जा सकेंगे, जिससे सजा की दर (Conviction Rate) बढ़ेगी।
  3. ​ब्लाइंड केस (जिनमें कोई सुराग नहीं होता) को सुलझाने में मदद मिलेगी।

​CM ने दी थी सौगात:

​गौरतलब है कि हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य की पुलिसिंग को स्मार्ट बनाने के लिए पटना से 34 मोबाइल फॉरेंसिक वैन को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। इसी के तहत मधुबनी जिले को भी यह सौगात मिली है। एसपी ने जिले की फॉरेंसिक टीम और पुलिस पदाधिकारियों को निर्देश दिया है कि सूचना मिलते ही वैन के साथ घटनास्थल पर पहुंचना सुनिश्चित करें।

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